सत्य ही शिव हैं और शिव ही सुंदर है। तभी तो भगवान आशुतोष को सत्यम शिवम सुंदरम कहा जाता है। भगवान शिव की महिमा अपरंपार है। भोलेनाथ को प्रसन्न करने का ही महापर्व है…शिवरात्रि…जिसे त्रयोदशी तिथि, फाल्गुण मास, कृष्ण पक्ष की तिथि को प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है। महाशिवरात्रि भारतीयों का एक प्रमुख त्यौहार है। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। माघ फागुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि का प्रारम्भ इसी दिन से हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग (जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है) के उदय से हुआ। इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था। यह पूजा व्रत रखने के दौरान की जाती है। साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है|भारत सहित पूरी दुनिया में महाशिवरात्रि का पावन पर्व बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है महाशिवरात्रि महाशिवरात्रि शिवजी का महापर्व यह पर शिव विवाह के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है अनजाने में किसी प्राणी मात्र द्वारा एक बेलपत्र भी शिवलिंग पर चढ़ जाए तो कोर्ट जन्मों के पापों को नीलेश्वर हर लेते हैं और इस जीवन को समृद्ध बनाकर अंत समय में मोक्ष प्रदान करते हैं और शिवरात्रि में वर्णित चारों प्रहर बेलपत्र और गंगाजल से पूजा द्वारा तो साक्षात मोक्ष ही मिल जाता है। फाल्गुन के महीने का 14 वां दिन था जिस दिन शिव ने पहली बार खुद को लिंग रूप में प्रकट किया था। इस दिन को बहुत ही शुभ और विशेष माना जाता है और महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। इस दिन शिव की पूजा करने से उस व्यक्ति को सुख और समृद्धि प्राप्त होती है। भारत के अधिकतर जनमानस यही जानते हैं कि महाशिवरात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के उपलक्ष में मनाया जाता है। शिवलिंग की उत्पत्ति पौराणिक कथाओं के मुताबिक इस ब्रह्मांड के सृष्टि बनने से पहले पृथ्वी एक अंतहीन शक्ति थी। सृष्टि बनने के बाद भगवान विष्णु पैदा हुए और भगवान विष्णु की नाभि से पैदा हुए भगवान ब्रह्मा। पृथ्वी पर पैदा होने के बाद कई सालों तक इन दोनों में युद्ध होता रहा है। दोनों आपस में एक दूसरे को ज्यादा शक्तिशाली मानते रहे। तभी आकाश में एक चमकता हुआ पत्थर दिखा और आकाशवाणी हुई कि जो इस पत्थर का अंत ढूंढ लेगा, उसे ही ज्यादा शक्तिशाली माना जाएगा। वह पत्थर शिवलिंग था। पत्थर का अंत ढूंढने के लिए भगवान विष्णु नीचे की ओर गए और भगवान ब्रह्मा ऊपर की ओर चले। हजारों सालों तक दोनों इस पत्थर का अंत ढूंढते रहे। लेकिन किसी को अंत नहीं मिला। भगवान विष्णु ने हाथ जोड़कर कहा कि हे प्रभु आप ही ज्यादा शक्तिशाली हैं। इस पत्थर का कोई अंत नहीं मिला। ब्रह्मा को भी इस पत्थर का अंत नहीं मिला। लेकिन ब्रह्मा ने सोचा कि अगर वो कहेंगे कि उन्हें भी अंत नहीं मिला तो विष्णु को ज्यादा ज्ञानी समझा जाएगा। इसलिए ब्रह्मा ने कहा कि उन्हें इस पत्थर का अंत मिल गया है। तभी आकाशवाणी हुई मैं शिवलिंग हूं और न ही मेरा कोई अंत हैं और न ही कोई शुरुआत। तभी उस शिवलिंग से भगवान शिवजी प्रकट होते हैं। सच बोलने के लिए भगवान विष्णु को वरदान मिलता है तो वहीं झूठ बोलने के लिए भगवान ब्रह्मा को श्राप दिया जाता है कि कोई उनकी पूजा नहीं करेगा। हालांकि बाद में ब्रह्मा ने श्राप से अपने आपको मुक्त करा लिया। ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता कहा जाता है तो वहीं विष्णु को सृष्टि का रक्षक कहा जाता है। ब्रह्मांड में संतुलन पैदा करने के लिए शिवलिंग पैदा हुआ। शिवलिंग धरती पर ब्रह्मा और विष्णु की लड़ाई खत्म करने के लिए पैदा हुए थे। हिंदू धर्म में मान्यताओं में शिवलिंग को पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है। शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि इसका कोई रंग नहीं होता। इसका किसी भी रंग से संपर्क होता है उसी रंग का बन जाता है। महाशिवरात्रि क्यों मनाते हैं? पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तीन कारणों से महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है, जिसमें शिव-पार्वती का विवाह सबसे ज्यादा प्रचलित है। इस कारण से महाशिवरात्रि को कई स्थानों पर रात्रि में शिव बारात भी निकाली जाती है। 1.हिंदू धर्म में हर माह मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है, लेकिन फाल्गुन माह में आने वाली महाशिवरात्रि का खास महत्व होता है. माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव और पार्वती का विवाह हुआ था. शास्त्रों की माने तों महाशिवरात्रि की रात ही भगवान शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभाव वाले ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे. इसके बाद से हर साल फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का त्योहार मनाया जाता है. कहा यह भी जाता है कि मां पार्वती सती का पुनर्जन्म है. मां पार्वती शिवजी को पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थी. इसके लिए उन्होंने शिवजी को अपना बनाने के लिए कई प्रयत्न किए थे, भोलेनाथ प्रसन्न नहीं हुए. इसके बाद मां पार्वती ने त्रियुगी नारायण से 5 किलोमीटर दूर गौरीकुंड में कठिन साधना की थी और शिवजी को मोह लिया था और इसी दिन शिवजी और मां पार्वती का विवाह हुआ था. 2 पुराणों के अनुसार समुंद्र मंथन के समय वासुकि नाग के मुख में भयंकर विष की ज्वालाएं उठी और वे समुद्र के जल में मिश्रित हो विष के रूप में प्रकट हो गई। विष की यह ज्वालाएं संपूर्ण आकाश में फैलकर समस्त चराचर जगत को जलाने लगी। इस भीषण स्थिति से घबरा देव, ऋषि, मुनि भगवान शिव के पास गए तथा भीषण तम स्थिति से बचाने का अनुरोध किया तथा प्रार्थना की कि हे प्रभु इस संकट से बचाइए।...
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