नई दिल्ली, 27 मार्च। कोरोना वायरस से संक्रमित नए मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। पिछले...
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मां पताल भैरवी माता दुर्गा का ही एक रूप है। कहा जाता है कि मां दुर्गा ने रक्तबीज नामक राक्षस का संहार करने को रौद्र रूप धारण किया। पताल भैरवी का मंदिर छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव में स्थित है पताल भैरवी का मंदिर जिसकी दुरी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 70 किलोमीटर है, कहते है की इस मंदिर का निर्माण 4 अप्रैल सन 1998 को किया गया था। तब से लेकर आज तक यह मंदिर माता के भक्तों के लिए व पूरे छत्तीसगढ़ के लिए एक विशेष श्रद्धा का केंद्र है। रक्तबीज राक्षस को मिली थी चमत्कारी शक्ति : रक्तबीज एक ऐसा राक्षस था जिसके रक्त का एक बूंद भी अगर जमीन मे गिरा तो वह एक बूंद रक्त एक नए नए राक्षस का रूप ले लेता था। इस विपदा के निवारण के लिए माता दुर्गा ने मां काली का रूप धारण किया व रक्तबीज का वध करके उसके पूरे रक्त को पी लिया। इस मंदिर में गर्भगृह में स्थित माता को माता काली का ही एक रूप माना जाता है। यह मंदिर कई मायनों में विशेष है श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर आस्था का केंद्र है। इस मंदिर के गर्भगृह में स्थित माता की मूर्ति काफी विशेष है। इस मूर्ति को इस प्रकार बनाया गया है कि कोई व्यक्ति इसे पहली बार देखते हैं तो वह आश्चर्यचकित रह जाता है। मता काली का यह रौद्र रूप काफी भयानक है। मंदिर के गर्भगृह मंदिर से लगभग 15 से 18 फीट की गहराई में स्थित है। गर्भगृह में स्थित मूर्ति लगभग 15 फीट ऊंची बताई जाती है और यह 15 फीट ऊंची मूर्ति पत्थर की बनाई गई है जो कि लगभग 11 टन भारी है। माता की मूर्ति के जमीन के 18 फीट की नीचे होने का मुख्य कारण है – ऐसा पुराणों और ग्रंथों में पता चलता है कि माता काली की यह रौद्र रूप जमीन के भीतर निवास करती थी इसीलिए इसे पताल भैरवी कहा जाता था और पताल भैरवी के ही निवास स्थल को आधारभूत मानकर इस मंदिर के गर्भगृह को भी जमीन के नीचे पाताल लोक में रखने की कोशिश की गई है। माता की यह स्थिति मूर्ति विशेष होने के कारण यह मंदिर पिछले कई वर्षों से श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। मां पाताल भैरवी राजनांदगांव का यह मंदिर 3 स्तरों में बना हुआ है निचले स्तर पर माता पाताल भैरवी को देखा जा सकता है। दूसरे स्तर पर त्रिपुर सुंदरी का तीर्थ है इसे नवदुर्गा भी कहा जाता है इसके पश्चात तीसरे और अंतिम स्तर शीर्ष पर भगवान शिव की विशाल शिवलिंग स्थापित है। शिवलिंग के संबंध में कहा जाता है कि यह शिवलिंग लगभग 108 फीट ऊंचा है। शिवलिंग के सामने ही भगवान शिव के वाहन नंदी की मूर्ति भी स्थापित है। मंदिर के पुजारियों का यह भी मानना है कि माता काली के साथ इतना बड़ा शिवलिंग देश के और किसी भी मंदिर में नहीं है। लेकिन इस कथन का कोई लिखित प्रमाण नहीं है हालांकि इस मंदिर के पुजारी इस मंदिर के शिवलिंग को देश का सबसे बड़ा माता काली की मूर्ति के साथ शिवलिंग बताते हैं। लेकिन सरकार इसका समर्थन नहीं करती। जलाई जाती है स्योती कलश : वर्ष के दोनों नवरात्रों में इस मंदिर में ज्योती कलश स्थापना की जाती है। यहां किए गए ज्योती कलश स्थापना का विशेष महत्व होता हैै। कई लोग यहां पर माता के दरबार में ज्योत जलाकर मनोकामना मांगते हैं तो कई लोग अपनी मनोकामना के पूरा हो जाने के पश्चात यहां पर ज्योत जलाते हैं। शरद पूर्णिमा में मिलती है औषधि : इस मंदिर में नवरात्रों के अलावा शरद पूर्णिमा के दिन एक विशेष प्रकार का जड़ी बूटी को खीर में डाला जाता है और एक औषधि युक्त खीर बनाया जाता है। इस खीर में विशेष प्रकार के जड़ी-बूटी होते हैं जो दमा अस्थमा और श्वास से जुड़ी कई बीमारियों को ठीक करने में मददगार होती है।इस खीर प्रसाद को पाने के लिए यहां पर शरद पूर्णिमा की रात को हजारों की संख्या में भक्त यहा आते हैं।...
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आधुनिक हिन्दी साहित्य में सबसे अधिक चर्चित काल छायावाद है. इसकाल की प्रमुख कवियों में जिस कवियत्री का नाम सबसे उपर है वो हैं महादेवी वर्मा. छायावाद अंग्रेजी साहित्यिक काल स्वच्छंदतावाद के समकालीन ही था. भक्ति काल की मीरा की तरह इनका प्रेम भी अलौकिक था और उसमें रहस्य की प्रचूर मात्रा थी. इनके साहित्यिक काव्यगत विशेषताओं के कारण इन्हें आधुनिक मीरा भी कहा जाता है. 1982 में इन्हें ज्ञानपीठ भी मिला. जीवन परिचय महादेवी वर्मा अपने परिवार में कई पीढ़ियों के बाद उत्पन्नहुई। उनके परिवार में दो सौ सालों से कोई लड़की पैदा नहीं हुई थी, यदि होती तो उसे मार दिया जाता था। दुर्गा पूजा के कारण आपका जन्म हुआ। आपके दादा फ़ारसी और उर्दू तथा पिताजी अंग्रेज़ी जानते थे। माताजी जबलपुर से हिन्दी सीख कर आई थी, महादेवी वर्मा ने पंचतंत्र और संस्कृत का अध्ययन किया। महादेवी वर्मा जी को काव्य प्रतियोगिता में ‘चांदी का कटोरा’ मिला था। जिसे इन्होंने गाँधीजी को दे दिया था। महादेवी वर्मा कवि सम्मेलन में भी जाने लगी थी, वो सत्याग्रह आंदोलन के दौरान कवि सम्मेलन में अपनी कवितायें सुनाती और उनको हमेशा प्रथम पुरस्कार मिला करता था। महादेवी वर्मा मराठी मिश्रित हिन्दी बोलती थी। जन्म महादेवी वर्मा का जन्म होली के दिन 26 मार्च, 1907 को फ़र्रुख़ाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ था। महादेवी वर्मा के पिता श्री गोविन्द प्रसाद वर्मा एक वकील थे और माता श्रीमती हेमरानी देवी थीं। महादेवी वर्मा के माता-पिता दोनों ही शिक्षा के अनन्य प्रेमी थे।[2] महादेवी वर्मा को ‘आधुनिक काल की मीराबाई’ कहा जाता है। महादेवी जी छायावाद रहस्यवाद के प्रमुख कवियों में से एक हैं। हिन्दुस्तानी स्त्री की उदारता, करुणा, सात्विकता, आधुनिक बौद्धिकता, गंभीरता और सरलता महादेवी वर्मा के व्यक्तित्व में समाविष्ट थी। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की विलक्षणता से अभिभूत रचनाकारों ने उन्हें ‘साहित्य साम्राज्ञी’, ‘हिन्दी के विशाल मंदिर की वीणापाणि’, ‘शारदा की प्रतिमा’ आदि विशेषणों से अभिहित करके उनकी असाधारणता को लक्षित किया। महादेवी जी ने एक निश्चित दायित्व के साथ भाषा, साहित्य, समाज, शिक्षा और संस्कृति को संस्कारित किया। कविता में रहस्यवाद, छायावाद की भूमि ग्रहण करने के बावज़ूद सामयिक समस्याओं के निवारण में महादेवी वर्मा ने सक्रिय भागीदारी निभाई। शिक्षा महादेवी वर्मा की प्रारम्भिक शिक्षा इन्दौर में हुई। महादेवी वर्मा ने बी.ए. जबलपुर से किया। महादेवी वर्मा अपने घर में सबसे बड़ी थी उनके दो भाई और एक बहन थी। 1919 में इलाहाबाद में ‘क्रॉस्थवेट कॉलेज’ से शिक्षा का प्रारंभ करते हुए महादेवी वर्मा ने 1932 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। तब तक उनके दो काव्य संकलन ‘नीहार’ और ‘रश्मि’ प्रकाशित होकर चर्चा में आ चुके थे।[3] महादेवी जी में काव्य प्रतिभा सात वर्ष की उम्र में ही मुखर हो उठी थी। विद्यार्थी जीवन में ही उनकी कविताएँ देश की प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाने लगीं थीं। विवाह उन दिनों के प्रचलन के अनुसार महादेवी वर्मा का विवाह छोटी उम्र में ही हो गया था परन्तु महादेवी जी को सांसारिकता से कोई लगाव नहीं था अपितु वे तो बौद्ध धर्म से बहुत प्रभावित थीं और स्वयं भी एक बौद्ध भिक्षुणी बनना चाहतीं थीं। विवाह के बाद भी उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी। महादेवी वर्मा की शादी 1914 में ‘डॉ. स्वरूप नरेन वर्मा’ के साथ इंदौर में 9 साल की उम्र में हुई, वो अपने माँ पिताजी के साथ रहती थीं क्योंकि उनके पति लखनऊ में पढ़ रहे थे। महादेवी वर्मा हिन्दी साहित्य के...
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