मुंबई, 23 मार्च । महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे अपने 40 विधायकों के साथ 6 अप्रैल को...
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डिब्रूगढ़, 23 मार्च । ऊपरी असम के डिब्रूगढ़ शहर में दो दिवसीय जी-20 की बैठक में हिस्सा...
गुवाहाटी, 23 मार्च । पूर्वोत्तर क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवा में आमूलचूल परिवर्तन लाने के उद्देश्य से कामरूप...
जब अंग्रेजों के अत्याचारों से त्रस्त हमारे देश में चारों ओर हाहाकार मची हुई थी तो ऐसे में इस वीर भूमि ने अनेक वीर सपूत पैदा किए जिन्होंने अंग्रेजों की दासता से मुक्ति दिलाने की खातिर अनेकों संघर्षपूर्ण प्रयत्न करते हुए हंसते-हंसते देश की खातिर कुर्बान हो गए। इन्हीं में तीन पक्के क्रांतिकारी दोस्त थे, शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव। इन तीनों ने अपने प्रगतिशील और क्रांतिकारी विचारों से भारत के नौजवानों में स्वतंत्रता के प्रति ऐसी दीवानगी पैदा कर दी कि अंग्रेज सरकार को डर लगने लगा था कि कहीं उन्हें यह देश छोड़कर भागना न पड़ जाए। तीनों ने ब्रिटिश सरकार की नाक में इतना दम कर दिया था जिसके परिणामस्वरूप उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 24 मार्च 1931 को तीनों को एक साथ फांसी देने की सजा सुना दी गई। इनकी फांसी की बात सुनकर लोग इतने भड़क चुके थे कि उन्होंने भारी भीड़ के रूप में उस जेल को घेर लिया था। अंग्रेज भयभीत थे कि कहीं विद्रोह न हो जाए। इसी को मद्देनजर रखते हुए उन्होंने एक दिन पहले यानी 23 मार्च 1931 की रात को ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी और चोरी-छिपे उनके शवों को जंगल में ले जाकर जला दिया। जब लोगों को इस बात का पता चला तो वे गुस्से में उधर भागे आए। अपनी जान बचाने और सबूत मिटाने के लिए अंग्रेजों ने उन वीरों की अधजली लाशों को बड़ी बेरहमी से नदी में फिकवा दिया। छोटी उम्र में आजादी के दीवाने तीनों युवा अपने देश पर कुर्बान हो गए। आज भी ये तीनों युवा पीढ़ी के आदर्श हैं। शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु इन तीनों की शहादत को पूरा संसार सम्मान की नजर से देखता है और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। जहां एक तरफ भगत सिंह और सुखदेव कालेज के युवा स्टूडैंट्स के रूप में भारत को आजाद कराने का सपना पाले थे, वहीं दूसरी ओर राजगुरु विद्याध्ययन के साथ कसरत के काफी शौकीन थे और उनका निशाना भी काफी तेज था। वे सब चंद्रशेखर आजाद के विचारों से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने क्रांतिकारी दल में शामिल होकर अपना विशेष स्थान बना लिया था। इस क्रांतिकारी दल का एक ही उद्देश्य था सेवा और त्याग की भावना मन में लिए देश पर प्राण न्यौछावर कर सकने वाले नौजवानों को तैयार करना। लाला लाजपतराय जी की मौत का बदला लेने के लिए 17 दिसम्बर 1928 को भगत सिंह और राजगुरु ने अंग्रेज अफसर सांडर्स पर गोलियां चलाईं। हालांकि वे रक्तपात के पक्ष में नहीं थे लेकिन अंग्रेजों के अत्याचारों और मजदूर विरोधी नीतियों ने उनके भीतर आक्रोश भड़का दिया था। अंग्रेजों को यह जताने के लिए कि अब उनके अत्याचारों से तंग आकर पूरा भारत जाग उठा है, भगत सिंह ने केंद्रीय असैंबली में बम फैंकने की योजना बनाई। वह यह भी चाहते थे कि किसी भी तरह का खून-खराबा न हो। इस काम के लिए उनके दल की सर्वसम्मति से भगत सिंह व बटुकेश्वर...
दुनिया में जब जब अत्याचार बढ़ा है, तब तब भगवान ने अपने भक्तों के लिए धरती में जन्म लिया है. युगों से ये बात चली आ रही है, भारत देश में कई भगवान, साधू संत ने जन्म लिया और दुनिया को सही गलत में फर्क समझाया है. सभी समाज धर्म के भगवान पाप को ख़त्म करने के लिए इस धरती पर आये | झूलेलाल को वेदों में वर्णित जल-देवता, वरुण का अवतार माना जाता है। वरुण देव को सागर के देवता, सत्य के रक्षक और दिव्य दृष्टि वाले देवता के रूप में सिंधी समाज भी पूजता है। सिंधी समाज के भगवान झूलेलाल का अवतरण धर्म के लिए हुआ है। पाकिस्तान के सिंध प्रांत से भारत के अन्य प्रांतों में आकर बस गए हिंदुओं में झूलेलाल को पूजने का प्रचलन ज़्यादा है। इतिहास सिंध में पहले हिन्दू राजा का शासन हुआ करता था, राजा धरार आखिरी हिन्दू राजा थे, उन्हें मोहम्मद बिन कासिम ने हरा दिया था. मुस्लिम राजा का सिंध की गद्दी में बैठने के बाद उसके चारों ओर इस्लाम समाज बढ़ता गया. दसवी सदी के दुसरे भाग में सिंध के ‘थट्टा’ राज्य में मकराब खान का शासन था, जिसे शाह सदाकत खान ने मार डाला व अपने आप को मिरक शाह नाम देकर गद्दी पर बैठ गया. उनका कहना था, अगर दुनिया में इस्लाम बढेगा, तो जन्नत यही बन जाएगी. इन्होंने हिंदुओ पर जुल्म करना शुरू कर दिया, सभी हिंदुओ को बोला गया, कि उन्हें इस्लाम अपनाना होगा, नहीं तो उन्हें मार डाला जायेगा. ऐसे में सिंध के सभी हिन्दू बहुत घबरा गए, तब सभी हिंदुओ को सिन्धु के नदी के पास इक्कठे होने के लिए बुलावा भेजा गया. हज़ार के उपर लोग वहां इकट्टा हुए, सबने मिलकर जल देवता दरियाशाह की उपासना और प्रार्थना की, कि इस विपदा में वे उनकी मदद करें. सभी ने लगातर 40 दिनों तक तप कि या, तब भगवान वरुण ने खुश होकर उन्हें आकाशवाणी के द्वारा बताया, कि वे नासरपुर में देवकी व ताराचंद के यहाँ जन्म लेंगें, वही बालक इनका रक्षक बनेगा. झुलेलाल जी का जन्म आकाशवाणी के 2 दिन बाद चैत्र माह की शुक्ल पक्ष में नासरपुर (पाकिस्तान की सिन्धु घाटी) के देवकी व ताराचंद के यहाँ एक बेटे ने जन्म लिया, जिसका नाम उदयचंद रखा गया. हिंदी में उदय का मतलब उगना होता है. भविष्य में ये छोटा बच्चा हिन्दू सिन्धी समाज का रक्षक बना, जिसने मिरक शाह जैसे शैतान का अंत किया. अपने नाम को चरितार्थ करते हुए उदयचंद जी ने सिंध के हिंदुओ के जीवन के अँधेरे को खत्म कर उजयाला फैला दिया. पहले उन्हें भगवान का रूप नहीं समझा गया, लेकिन अपने जन्म के बाद ही वे चमत्कार करने लगे. जन्म के बाद जब उनके माता पिता ने उनके मुख के अंदर पूरी सिन्धु नदी को देखा, जिसमें पालो नाम की एक मछली भी तैर रही थी, तब वे हैरान रह गए. इसलिए झुलेलाल जी को पेल वारो भी कहा जाता है. बहुत से सिन्धी हिन्दू उन पर विश्वास करते थे, और उनको भगवान का रूप मानते थे, इसलिए कुछ लोग उन्हें अमरलाल भी कहते थे. झुलेलाल जी को उदेरो लाल भी कहते है, संस्कृत में इसका मतलब है कि जो पानी के करीब रहता है या पानी में तैरता है. बाल्यावस्था में उदयचंद को झुला बहुत पसंद था, वे उसी पर आराम करते थे, इसी के बाद उनका नाम झुलेलाल पड़ गया. उनकी माता देवकी उन्हें प्यार से झुल्लन बोलती थी. उनकी माता का देहांत छोटी उम्र में ही हो गया था, जिसके बाद उनका पालन पोषण सौतेली माँ ने ही किया. झुलेलाल जी द्वारा किये गए कार्य मिरक शाह ने सिंध के सभी हिंदुओ को बुलाकर उनसे पुछा, कि वे इस्लाम अपना रहे या म्रत्यु चाहते है. तब झुलेलाल जी का जन्म हो चूका था, सबको उन पर और वरुण देव की भविष्यवाणी पर पूरा विश्वास था, तब सबने मिरक शाह से सोचने के लिए और समय माँगा. (क्यूंकि उस समय उदयचंद छोटा था, बाल्यावस्था में किसी को मारना नामुमकिन था, इसलिए सभी हिन्दू चाहते थे कि ये समय निकल जाये और उदयचंद बड़ा हो जाये) मिरक शाह को उस बच्चे के बारे में पता था, लेकिन उसे ये लगता था, कि इतना छोटा बच्चा क्या कर सकता है, यही सोचकर उसने हिंदुओ को और समय दे दिया. मिरक शाह ने अपने एक मंत्री को उस बच्चे की जांच पड़ताल के लिए भेजा व उसे मारने के आदेश भी दे दिए. उदेरोलाल ने किशोर अवस्था में ही अपना चमत्कारी पराक्रम दिखाकर जनता को ढाँढस बँधाया और यौवन में प्रवेश करते ही जनता से कहा कि बेखौफ अपना काम करे। उदेरोलाल ने बादशाह को संदेश भेजा कि शांति ही परम सत्य है। इसे चुनौती मान बादशाह ने उदेरोलाल पर आक्रमण कर दिया। बादशाह का दर्प चूर-चूर हुआ और पराजय झेलकर उदेरोलाल के चरणों में स्थान माँगा। उदेरोलाल ने सर्वधर्म समभाव का संदेश दिया। इसका असर यह हुआ कि मिरक शाह उदयचंद का परम शिष्य बनकर उनके विचारों के प्रचार में जुट गया। झूलेलाल की शक्ति से प्रभावित होकर ही मिरक शाह ने अमन का रास्ता अपनाकर बाद में कुरुक्षेत्र में एक ऐसा भव्य मंदिर बनाकर दिया, जो आज भी हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक और पवित्र स्थान माना जाता है। अन्य नाम पाकिस्तान में झूलेलाल जी को जिंद पीर और लालशाह के नाम से जाना जाता है। हिन्दू धर्म में भगवान झूलेलाल को उदेरोलाल, लालसाँई, अमरलाल, जिंद पीर, लालशाह आदि नाम से जाना जाता है। इन्हें जल के देवता वरुण का अवतार माना जाता है। उपासक भगवान झूलेलाल को उदेरोलाल, घोड़ेवारो, जिन्दपीर, लालसाँई, पल्लेवारो, ज्योतिनवारो, अमरलाल आदि नामों से पूजते हैं। सिन्धु घाटी सभ्यता के निवासी चैत्र मास के चन्द्र दर्शन के दिन भगवान झूलेलाल जी का उत्सव संपूर्ण विश्व में चेटीचंड के त्योहार के रूप में परंपरागत हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। भगवान झूलेलालजी को जल और ज्योति का अवतार माना गया है, इसलिए काष्ठ का एक मंदिर बनाकर उसमें एक लोटी से जल और ज्योति प्रज्वलित की जाती है और इस मंदिर को श्रद्धालु चेटीचंड के दिन अपने सिर पर उठाकर, जिसे बहिराणा साहब भी कहा जाता है, भगवान वरुण देव का स्तुतिगान करते हैं एवं समाज का परंपरागत नृत्य छेज करते हैं। झूलेलाल महोत्सव...
माँ दुर्गा की नवशक्तियों का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहाँ ब्रह्म शब्द का अर्थ तपस्या है। ब्रह्मचारिणी अर्थात् तप की चारिणी-तप का आचरण करने वाली। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल है। अपने पूर्व जन्म में जब ये हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थीं, तब नारद के उपदेश से इन्होंने भगवान शंकर जी को प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। इसी दुष्कर तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। इन्होंने एक हज़ार वर्ष तक केवल फल खाकर व्यतीत किए और सौ वर्ष तक केवल शाक पर निर्भर रहीं। उपवास के समय खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के विकट कष्ट सहे, इसके बाद में केवल ज़मीन पर टूट कर गिरे बेलपत्रों को खाकर तीन हज़ार वर्ष तक भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। कई हज़ार वर्षों तक वह निर्जल और निराहार रह कर व्रत करती रहीं। पत्तों को भी छोड़ देने के कारण उनका नाम ‘अपर्णा’ भी पड़ा। इस कठिन तपस्या के कारण ब्रह्मचारिणी देवी का पूर्वजन्म का शरीर एकदम क्षीण हो गया था। उनकी यह दशा देखकर उनकी माता मैना देवी अत्यन्त दुखी हो गयीं। उन्होंने उस कठिन तपस्या विरत करने के लिए उन्हें आवाज़ दी उमा, अरे नहीं। तब से देवी ब्रह्मचारिणी का पूर्वजन्म का एक नाम ‘उमा’ पड़ गया था। उनकी इस तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया था। देवता, ॠषि, सिद्धगण, मुनि सभी ब्रह्मचारिणी देवी की इस तपस्या को अभूतपूर्व पुण्यकृत्य बताते हुए उनकी सराहना करने लगे। अन्त में पितामह ब्रह्मा जी ने आकाशवाणी के द्वारा उन्हें सम्बोधित करते हुए प्रसन्न स्वरों में कहा- ‘हे देवी । आज तक किसी ने इस प्रकार की ऐसी कठोर तपस्या नहीं की थी। तुम्हारी मनोकामना सर्वतोभावेन पूर्ण होगी। भगवान चन्द्रमौलि शिव जी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तुम तपस्या से विरत होकर घर लौट जाओ।’ माँ दुर्गा का यह दूसरा स्वरूप भक्तों को अनन्त फल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार व संयम की वृद्धि होती है। सर्वत्र सिद्धि और विजय प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र में होता है। इस चक्र में अवस्थित मन वाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्त्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता। माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय प्राप्त होती है। यूँ तो माँ की पूजा कोई भी कर सकता है सबको लाभ होगा पर विशेष तौर पर लालसाओं से मुक्ति के लिए माँ ब्रह्मचारिणी का ध्यान लगाना अच्छा होता हैं।बार-बार मेहनत करने के बाद भी जिनको सफलता नहीं मिलती है उनको माँ की पूजा करने से लाभ मिलेगा।या जिनको अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा में विकास करना हो उनके लिए भी देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा लाभदायक सिद्ध होगी। पूजा विधि देवी को पंचामृत से स्नान कराएं, फिर अलग-अलग तरह के फूल,अक्षत, कुमकुम, सिंदूर, अर्पित करें। देवी ब्रह्मचारिणी को सफेद और सुगंधित पुष्प अत्यधिक प्रिय है। इसके अलावा कमल,गुलाब,गुड़हल या कोई भी लाल रंग का फूल भी देवी मां को चढ़ाएं।देसी घी का दीपक प्रज्वलित कर ऊँचे स्वर में माँ की आरती करें एवं हाथों में एक फूल लेकर उनका ध्यान करें और प्रार्थना करते हुए मंत्र बोलें।
ऑस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान वर्तमान में लंदन में आगामी तमिल मैग्नम ओपस पोन्नियिन सेलवन 2 के...
पूरी दुनिया में तालीम और अध्यापन से जुड़े लोगों में बड़ी संजीदगी से यह चर्चा चल रही...
जब आंखों के हेल्दी रखने की बात आती है, तो ज्यादातर लोगों का मानना होता है कि...
तमुलपुर, 23 मार्च। भारतीय पुरुष टीम ने बुधवार को नेपाल को हराकर असम में बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन...
