दुर्ग । नगर पालिक निगम में मेयर इन काउंसिल की बैठक महापौर धीरज बाकलीवाल की अध्यक्षता व आयुक्त...
छत्तीसगढ़
भगवान शिव का यह प्राचीन मंदिर छत्तीसगढ़ राज्य के देवबलोदा नामक गाँव की गोद में बसा हुआ है जो राजधानी रायपुर से लगभग 22 किमी दूर स्थित है। रायपुर-दुर्ग महामार्ग पर, भिलाई-3 चरोदा की रेल पटरी के किनारे बसे इस सुन्दर गाँव में स्थित यह ऐतिहासिक मंदिर अपनी पुरातनता, इतिहास एवं उत्कृष्ट कारीगरी के साथ साथ रहस्यमयी किवदंतियों के लिए भी अत्यंत लोकप्रिय है। अब यह भारतीय पुरातत्व संरक्षण विभाग के अंतर्गत एक संरक्षित क्षेत्र भी है। देवबलोदा शिव मंदिर का इतिहास भारतीय पुरातत्व संरक्षण विभाग द्वारा स्थापित सूचना पटल के अनुसार नागर शैली में निर्मित इस शिव मंदिर का निर्माण 13-14सदी में कलचुरी राजवंश के राजाओं ने करवाया था। इस मंदिर को छमासी मंदिर भी कहते हैं। देवबलोदा शिव मंदिर से जुड़ी किवदंतियां भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सेवानिवृत गंगाधर नागदेवे बताते हैं कि मंदिर के बारे में मान्यता यह भी है कि जब शिल्पकार मंदिर को बना रहा था तब वह इतना लीन हो चुका था कि उसे अपने कपड़े तक की होश नहीं थी। दिन रात काम करते-करते वह निर्वस्त्र अवस्था में पहुंच चुका था। उस शिल्पकार के लिए एक दिन पत्नी की जगह बहन भोजन लेकर आई। जब शिल्पी ने अपनी बहन को सामने देखा तो दोनों ही शर्मिंदा हो गए। शिल्पी ने खुद को छुपाने मंदिर के ऊपर से ही कुंड में छलांग लगा दी। बहन ने देखा कि भाई कुंड में कूद गया तो इस गम में उसने भी बगल के तालाब में कूद कर प्राण त्याग दिए। आज भी कुंड और तालाब दोनों मौजूद है, और तालाब का नाम भी करसा तालाब पड़ गया क्योंकि जब वह अपने भाई के लिए भोजन लेकर आई थी, तो भोजन के साथ सिर पर पानी का कलश भी था। तालाब के बीचो बीच कलशनुमा पत्थर आज भी मौजूद है। छः मासी रात में बने शिव मंदिर है अधूरा मंदिर के निर्माण से जुड़ी एक कहानी यह भी है कि जब इस मंदिर का निर्माण किया जा रहा था। उस दौरान छह महीने तक लगातार रात ही थी। इसलिए इसे 6 मासी मंदिर के रूप में जाना जाता है । छ:मासी मंदिर की कहानी यह भी है। छह मासी रात बीत जाने के बाद दिन हो गया। जिसके कारण इसके ऊपर गुंबद के निर्माण को अधूरा छोड़ दिया गया,,, राजा ने इस मंदिर को छह मासी रात में पूर्ण करने की जिम्मेदारी शिल्पकार को दी थी। मंदिर के अंदर करीब तीन फीट नीचे गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग और मंदिर के बाहर बने कुंड को लेकर प्रचलित लोक कथाओं के बीच यह मंदिर अपने आप में खास है। बताया जाता है कि मंदिर को बनाने वाला शिल्पी इसे अधूरा छोड़कर ही चला गया था, इसलिए इसका गुंबद ही नहीं बन पाया। दूसरे कुंए के अंदर एक गुप्त सुरंग है। जो सीधे आरंग में निकलता है। इसी गुप्त सुरंग से शिल्पकार मन्दिर अधूरा छोड़ आरंग पहुंच गया था। आरंग पहुंचने के बाद श्राप वश शिल्पकार पत्थर का हो गया जो आज भी आरंग में देखा जा सकता है। मंदिर के चारों तरफ अद्भुत की गई है कारीगिरी इस...
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