रायपुर। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद नियुक्ति आदेशों की बाढ़ आ गई है। मुख्यमंत्री बघेल के निर्देश...
छत्तीसगढ़
राजनांदगांव । कलेक्टर ने कलेक्टोरेट सभाकक्ष में बैंकर्स की बैठक ली। बैठक में उन्होंने जिले के अंतर्गत विभिन्न...
यह मंदिर कांकेर शहर में स्थित है। शिवानी मां मंदिर को शिवानी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है और दोहरी देवी दुर्गा और काली को समर्पित है। लंबवत आधा भाग देवी काली को समर्पित है जबकि शेष आधा भाग देवी दुर्गा को समर्पित है। यहां के लोगों का मानना है कि देवी स्वयं इन दोनों पूजनीय देवियों के व्यक्तित्व का एक संयोजन इस मंदिर में नवरात्रि पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। इस मंदिर में सभी धर्मों के लोगों की आस्था है। शिवानी मंदिर, कांकेर का खूबसूरत शहर कांकेर जिले में एक नगर पालिका है। कांकेर जिला छत्तीसगढ़ के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित है। जिले से होकर बहने वाली पांच नदियों में हटकुल नदी, महानदी नदी, तुरु नदी, सिंदूर नदी और दूध नदी शामिल हैं। इतिहास शिवानी मंदिर, छत्तीसगढ़ शहर के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। यह मंदिर लंबे समय से दुनिया भर से पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता आ रहा है। मंदिर की संरचना मंदिरों के निर्माण की प्राचीन शैली को दर्शाती है और एक जातीय और पारंपरिक रूप को दर्शाती है। शिवनी मंदिर में देवी आकार दो देवीयों से मिलकर बनती है। दोनों देवी...
रायपुर (छत्तीसगढ़), 10 अप्रैल । विश्व हिंदू परिषद और हिंदू संगठनों के आज राज्यव्यापी बंद के आह्वान...
मां पताल भैरवी माता दुर्गा का ही एक रूप है। कहा जाता है कि मां दुर्गा ने रक्तबीज नामक राक्षस का संहार करने को रौद्र रूप धारण किया। पताल भैरवी का मंदिर छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव में स्थित है पताल भैरवी का मंदिर जिसकी दुरी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 70 किलोमीटर है, कहते है की इस मंदिर का निर्माण 4 अप्रैल सन 1998 को किया गया था। तब से लेकर आज तक यह मंदिर माता के भक्तों के लिए व पूरे छत्तीसगढ़ के लिए एक विशेष श्रद्धा का केंद्र है। रक्तबीज राक्षस को मिली थी चमत्कारी शक्ति : रक्तबीज एक ऐसा राक्षस था जिसके रक्त का एक बूंद भी अगर जमीन मे गिरा तो वह एक बूंद रक्त एक नए नए राक्षस का रूप ले लेता था। इस विपदा के निवारण के लिए माता दुर्गा ने मां काली का रूप धारण किया व रक्तबीज का वध करके उसके पूरे रक्त को पी लिया। इस मंदिर में गर्भगृह में स्थित माता को माता काली का ही एक रूप माना जाता है। यह मंदिर कई मायनों में विशेष है श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर आस्था का केंद्र है। इस मंदिर के गर्भगृह में स्थित माता की मूर्ति काफी विशेष है। इस मूर्ति को इस प्रकार बनाया गया है कि कोई व्यक्ति इसे पहली बार देखते हैं तो वह आश्चर्यचकित रह जाता है। मता काली का यह रौद्र रूप काफी भयानक है। मंदिर के गर्भगृह मंदिर से लगभग 15 से 18 फीट की गहराई में स्थित है। गर्भगृह में स्थित मूर्ति लगभग 15 फीट ऊंची बताई जाती है और यह 15 फीट ऊंची मूर्ति पत्थर की बनाई गई है जो कि लगभग 11 टन भारी है। माता की मूर्ति के जमीन के 18 फीट की नीचे होने का मुख्य कारण है – ऐसा पुराणों और ग्रंथों में पता चलता है कि माता काली की यह रौद्र रूप जमीन के भीतर निवास करती थी इसीलिए इसे पताल भैरवी कहा जाता था और पताल भैरवी के ही निवास स्थल को आधारभूत मानकर इस मंदिर के गर्भगृह को भी जमीन के नीचे पाताल लोक में रखने की कोशिश की गई है। माता की यह स्थिति मूर्ति विशेष होने के कारण यह मंदिर पिछले कई वर्षों से श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। मां पाताल भैरवी राजनांदगांव का यह मंदिर 3 स्तरों में बना हुआ है निचले स्तर पर माता पाताल भैरवी को देखा जा सकता है। दूसरे स्तर पर त्रिपुर सुंदरी का तीर्थ है इसे नवदुर्गा भी कहा जाता है इसके पश्चात तीसरे और अंतिम स्तर शीर्ष पर भगवान शिव की विशाल शिवलिंग स्थापित है। शिवलिंग के संबंध में कहा जाता है कि यह शिवलिंग लगभग 108 फीट ऊंचा है। शिवलिंग के सामने ही भगवान शिव के वाहन नंदी की मूर्ति भी स्थापित है। मंदिर के पुजारियों का यह भी मानना है कि माता काली के साथ इतना बड़ा शिवलिंग देश के और किसी भी मंदिर में नहीं है। लेकिन इस कथन का कोई लिखित प्रमाण नहीं है हालांकि इस मंदिर के पुजारी इस मंदिर के शिवलिंग को देश का सबसे बड़ा माता काली की मूर्ति के साथ शिवलिंग बताते हैं। लेकिन सरकार इसका समर्थन नहीं करती। जलाई जाती है स्योती कलश : वर्ष के दोनों नवरात्रों में इस मंदिर में ज्योती कलश स्थापना की जाती है। यहां किए गए ज्योती कलश स्थापना का विशेष महत्व होता हैै। कई लोग यहां पर माता के दरबार में ज्योत जलाकर मनोकामना मांगते हैं तो कई लोग अपनी मनोकामना के पूरा हो जाने के पश्चात यहां पर ज्योत जलाते हैं। शरद पूर्णिमा में मिलती है औषधि : इस मंदिर में नवरात्रों के अलावा शरद पूर्णिमा के दिन एक विशेष प्रकार का जड़ी बूटी को खीर में डाला जाता है और एक औषधि युक्त खीर बनाया जाता है। इस खीर में विशेष प्रकार के जड़ी-बूटी होते हैं जो दमा अस्थमा और श्वास से जुड़ी कई बीमारियों को ठीक करने में मददगार होती है।इस खीर प्रसाद को पाने के लिए यहां पर शरद पूर्णिमा की रात को हजारों की संख्या में भक्त यहा आते हैं।...
भोरमदेव मंदिर छत्तीसगढ़ के कबीरधाम से 18 कि.मी. दूर तथा रायपुर से 125 कि.मी की दुरी में यहाँ कबीरधाम जिले के चौरागाँव में स्थित एक प्राचीन मंदिर है, यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर कृत्रिमतापूर्वक पर्वत शृंखला के बीच स्थित है, यह लगभग 7 से 11 वीं शताब्दी तक की अवधि में बनाया गया था। यहाँ मंदिर में खजुराहो मंदिर की झलक दिखाई देती है, इसलिए इस मंदिर को “छत्तीसगढ़ का खजुराहो” भी कहा जाता है. यह मंदिर भगवान शिव और भगवान गणेश की छवियों के अलावा, भगवान विष्णु के दस अवतारों की छवियों को भी चित्रित करता है। भोरमदेव मंदिर नागर शैली और जटिल नक्काशीदार चित्र कला का एक शानदार नमूना है जो श्रद्धालुओं के साथ साथ देश भर से इतिहास और कला प्रेमियों को भी आकर्षित करता है। भोरमदेव मंदिर का इतिहास ऐतिहासिक और पुरातात्विक विभाग द्वारा की गयी खोज और यहाँ मिले शिलालेखो के अनुसार भोरमदेव मंदिर का इतिहास 10 वीं से 12 वीं शताब्दी के बीच कलचुरी काल का माना जाता है। भोरमदेव मंदिर के निर्माण का श्रेय नागवंशी वंश के लक्ष्मण देव राय और गोपाल देव को दिया गया है। कहा जाता है कि नागवंशी राजा गोपाल देव ने इस मंदिर को...
छत्तीसगढ़ प्राचीन काल से ही देवी देवताओं का एक प्रमुख स्थान रहा है। यहां पर प्राचीन काल से ही शिव उपासना के साथ-साथ देवी उपासना को काफी महत्व मिला है। छत्तीसगढ़ में अलग-अलग समय में अलग-अलग राजाओं और ग्राम मुखिया द्वारा एक विशेष कथाओं के कारण अनेक मंदिरों का निर्माण कराया गया है। छत्तीसगढ़ में देवताओं के ज्यादा मंदिर नहीं है लेकिन यहां पर देवियों पर आधारित अनेक मंदिर हैं और इन देवियों के मंदिर में अनेक रूप में पूजी जाती है। इन सभी देवियों के मंदिर में देवी के चमत्कार के कारण लगातार श्रद्धालुओं की संख्या में काफी वृद्धि देखी गई और इसी के कारण इन स्थलों को शक्तिपीठ का मान्यता भी प्रदान किया गया। वर्तमान में छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्तिपीठ रतनपुर का महामाया मंदिर, चंद्रपुर का चंद्रहासिनी मंदिर, डोंगरगढ़ की बमलेश्वरी मंदिर और दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर को विशेष रूप से श्रद्धा प्राप्त है। दंतेवाड़ा...
रायपुर, 11 मार्च । छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नई दिल्ली में शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र...
धान का कटोरा कहे जाने वाले यह छत्तीसगढ़ अपनी विशेषता के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है। आज हम छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में स्थित खल्लारी माता के मंदिर के बारे में बात करेंगे। माता का यह मंदिर खल्लारी ग्राम की पहाड़ियों पर बिल्कुल शीर्ष पर स्थित है। यह महासमुंद में दक्षिण की ओर 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। खल्लारी का इतिहास देखा जाए तो आपको बता दें कि जब कलचुरी वंश की एक शाखा रायपुर पर स्थापित की गई थी तब कलचुरी वंश की शुरुआती राजधानी खल्लारी थी। उस समय में खल्लारी का पूरा इलाका मृतकागड़ नाम से जाना जाता था। सन 1409 में ब्रह्मा देव राय के राज में कलचुरी वंश की राजधानी को खल्लारी से रायपुर में बदल दिया गया था। बात करें खल्लारी और रायपुर के बीच की दूरी की तो खल्लारी और रायपुर के बीच लगभग 80 किलोमीटर का फासला है। वैसे तो छत्तीसगढ़ के सभी क्षेत्रों का बखान महाभारत में वर्णित है। ठीक उसी प्रकार महाभारत में इस जगह को खाल्लवतिका के नाम से जाना जाता था। इस जगह का वर्णन महाभारत और रामायण में भी मिलता है इस इस मंदिर के इतिहास में दो कथाएं काफी प्रचलित है पहला भीम और हिडिंबा की ब्याह की और दूसरी कथा है पांडवो की हत्या का षडयंत्र। खल्लारी माता मंदिर का...
रायपुर , 28 फरवरी (हि.स.)। रायपुर विकास प्राधिकरण ने अब कमल विहार, इन्द्रप्रस्थ रायपुरा और बोरियाखुर्द की...
