आस्था व भक्ति का केन्द्र माता भद्रकाली का परम पावन दरबार उत्तराखंड राज्य के बागेश्वर जिले के कमस्यार घाटी में स्थित माता भद्रकाली का परम पावन दरबार सदियों से आस्था व भक्ति का केन्द्र है। कहा जाता है कि माता भद्रकाली के इस दरबार में मांगी गई मन्नत कभी भी व्यर्थ नहीं जाती है। जो श्रद्धा व भक्ति के साथ अपनी आराधना और श्रद्धा के साथ मां के चरणों में पुष्प अर्पित करता है। वह परम कल्याण का भागी बनता है। माता भद्रकाली का यह धाम बागेश्वर जनपद में महाकाली के स्थान, कांडा से करीब 15 किमी और जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी की दूरी पर सानिउडियार होते हुए बांश पटान,सेराघाट निकलने वाली सड़क पर भद्रकाली नाम के गांव में स्थित है। यह स्थान इतना मनोरम है कि इसका वर्णन करना वास्तव में बेहद कठिन है। माता भद्रकाली का प्राचीन मंदिर करीब 200 मीटर की चौड़ाई के एक बड़े भूखंड पर स्थित है भद्रकाली गुफा। इस गुफा के अन्दर एक सुरम्य पर्वतीय नदी बहती है। जो कि विशाल शक्ति कुंड के नाम से जाना जाता है। मां भद्रकाली को पूर्ण रूप से वैष्णवस्वरूप में पूजा जाता है, मां भद्रकाली को ब्रह्मचारिणी के नाम से भी जाना जाता है। वैष्णोंदेवी मन्दिर के अलावा भारत भूमि में यही एक अदभुत स्थान है। जहां माता भद्रकाली की महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती तीनो रूपों में पूजा होती है। इन स्वरूपों में पूजन होने के कारण इस स्थान का महत्व प्राचीन काल से पूज्यनीय रहा है, आदि गुरू शंकराचार्य ने इस स्थान के दर्शन कर स्वयं को धन्य माना। माता भद्रकाली मंदिर की मान्यता माना जाता है कि यहां पर मंदिर का निर्माण लगभग सन् 930 में एक महायोगी संत ने कराया था देवी के इस दरबार में समय-समय पर अनेकों धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न होते रहते है। मंदिर में पूजा के लिए चंद राजाओं के समय से आचार्य एवं पूजारियों की व्यवस्था की गई थी। माता भद्रकाली का जिक्र श्रीमद देवी भागवत के अतिरिक्त शिव पुराण और स्कन्द पुराण के मानस खंड में आता है, कहते है कि माता भद्रकाली ने स्वयं इस स्थान पर छः माह तक तपस्या की थी,यहां नवरात्री की अष्टमी के दिन श्रद्धालु पुरी रात्रि हाथ में दीपक लेकर मनवांछित फल प्राप्त करने के लिए तपस्या करते है। क्या माता भद्रकाली मंदिर को अंग्रेजों ने कर रहित किया मंदिर में ही पिछले करीब डेढ़ दशक से साधनारत बाबा निर्वाण चेतन मुनि उदासीन मुनि बताते हैं कि अंग्रेजी दौर से ही यह स्थान कर रहित रहा है। अंग्रेजों ने भी इस स्थान को अत्यधिक धार्मिक महत्व का मानकर कर रहित घाषित किया था। आज भी यहाँ किसी प्रकार शुल्क नहीं लिया जाता है। यह भी माना जाता है कि माता भद्रकाली भगवान श्रीकृष्ण की कुलदेवी यानी ईष्टदेवी थीं।उनका एक मंदिर कुरूक्षेत्र हरियाणा, दूसरा झारखंड एवं तीसरा नेपाल के भद्रकाली जिले में भी स्थित है। कहा जाता हैं कि आदि- अनादि काल में सृष्टि की रचना के समय आदि शक्ति ने त्रिदेवों-ब्रह्मा, विष्णु व महेश के साथ उनकी शक्तियों-सृष्टि का पालन व ज्ञान प्रदान करने वाली ब्रह्माणी यानी माता सरस्वती, पालन वाली वैष्णवी यानी माता लक्ष्मी और बुरी शक्तियों का संहार करने वाली शिवा यानी माता महाकाली का भी सृजन किया। कम ही लोग जानते है कि माता सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली तीनो एक ही स्थान पर आदि-अनादि काल से एक साथ माता भद्रकाली के रूप में विराजती है। और सच्चे मन से आने वाले भक्तों को साक्षात दर्शन देकर उनके कष्टों को दूर करती है। हनुमानगढ़ का भद्रकाली माता का अनूठी परम्परा वाला मंदिर जहाँ आज भी चढ़ती है बलि आज जिस मंदिर की बात कर रहे हैं वह हनुमानगढ़ स्थित भद्रकाली माता का मंदिर है।मंदिर का इतिहास थोड़ा अतीत में है। कथा का प्रसंग इस प्रकार है कि तकरीबन 500 वर्ष पहले मुगल बादशाह अकबर इस इलाके से गुजर रहा था उस समय यह पूरा बियाबान जंगल था। इस जंगल में उसे एक बुढ़िया दिखायी दी। यह बुढ़िया वर्तमान भद्रकाली माता ही थी। बुढ़िया से अकबर ने कहा की माई मुझे प्यास लगी है पानी मिल सकता है। बुढ़िया ने उसे जमीन से थोड़ा पानी निकालकर पानी दिया।...
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तम्बाकू पौधे की पत्तियों से प्राप्त होता है।यह एक मादक और उत्तेजक (narcotic and stimulant)पदार्थ है, जो ‘निकोशियाना” (अंग्रेज़ी नाम : Nicotiana) जाति के पौधे की बारीक कटी हुई पत्तियों, जो कि खाने-पीने तथा सूँघने के काम आती हैं, से प्राप्त किया जाता है। किसी अन्य मादक या उत्तेजक पदार्थ की अपेक्षा तम्बाकू का प्रयोग आज सबसे अधिक मात्रा में किया जा रहा है। भारत में तम्बाकू का पौधा पुर्तग़ालियों द्वारा सन 1608 ई. में लाया गया था और तब से इसकी खेती का क्षेत्र भारत के लगभग सभी भागों में फैल गया है। भारत विश्व के उत्पादन का लगभग 7.8 प्रतिशत तम्बाकू उत्पन्न करता है। उत्पत्ति तथा इतिहास:- तम्बाकू की उत्पत्ति कब और कहाँ हुई, इसका ठीक पता नहीं चलता। कहते हैं कि, एक बार पुर्तग़ाल स्थित फ्राँसीसी राजदूत ‘जॉन निकोट’ ने अपनी रानी के पास तम्बाकू का बीज भेजा और तभी से इस पौधे का प्रवेश प्राचीन संसार में हुआ। निकोट के नाम को अमर रखने के लिये तम्बाकू का वानस्पतिक नाम ‘निकोशियाना’ रखा गया। तम्बाकू दक्षिणी अमेरिका का पौधा माना जाता है। इसकी खेती ऐतिहासि काल से हाती चली आ रही है। यद्यपि तम्बाकू अयनवृत्तीय(Equatorial) पौधा है, तथापि इसकी सफल खेती अन्य स्थानों में भी होती है, क्योंकि यह अपने को विभिन्न प्रकार की भूमि तथा जलवायु के अनुकूल बना लेता है। विभिन्न जातियाँ अब तक संसार में तम्बाकू की 60 विभिन्न जातियाँ मिल चुकी हैं। इनमें से ‘निकोशियाना टबैकम’ और ‘निकोशियाना रस्टिका’ की खेती बड़े पैमाने पर होती है। खेती तथा व्यापार की दृष्टि से केवल ये ही दो जातियाँ उपयोगी सिद्ध हुई हैं। भारत में तम्बाकू का आगमन:- ऐसा माना जाता है कि, 17वीं सदी में पुर्तग़ालियों द्वारा भारत में तम्बाकू की खेती का प्रारंभ हुआ। 17वीं, 18वीं सदियों में यूरोपीय यात्रियों ने भारत में तम्बाकू की खेती और उसके उपयोग का उल्लेख किया है। मुग़ल सम्राट जहाँगीर के समय में तम्बाकू की खेती का प्रचार नहीं हो पाया, क्योंकि उन्होंने घोषणा की थी, कि तम्बाकू पीनेवालों के होठों को काट दिया जाएगा। व्हाइटलॉ आइन्स्ली की लिखी हुई ‘मेटिरिया इंडिका’ नामक पुस्तक में देशी तथा यूरोपीय डॉक्टरों द्वारा भारत में दवा संबंधी प्रयोजनों के लिये तम्बाकू के उपयोग के बारे में लिखा है। सामाजिक रुकावटों के अभाव के कारण अब धूम्रपान सरलता से अपनाई जानेवाली आदत बन गई है। राजस्व प्राप्ति का साधन:- आज विश्वभर में अमेरीका तथा चीन के बाद बड़े पैमाने पर तम्बाकू पैदा करने वाला तीसरा राष्ट्र भारत है। आज भारत तथा विश्व में अन्य राष्ट्रों की सरकारों के लिये तम्बाकू कर के रूप में कामधेनु के समान है। कृषक के लिये तम्बाकू बहुत ही मुख्य नक़द शस्य (फ़सल) है। प्रतिवर्ष अनुमानत: 45 करोड़ रुपए तम्बाकू की खेती से उत्पादकों को मिलते हैं। इसके अतिरिक्त केंद्रीय सरकार को 45 करोड़ रुपये तम्बाकू उत्पादन शुल्क, अनुमानत: दो करोड़ निर्यातकर (Export tax)और देश को 16 करोड़ की मूल्य का विदेशी विनिमय मिलता है। तम्बाकू की खेती करने वाले निर्माता, निर्यातक तथा अनगिनत मध्यवर्ती लोग इससे खूब लाभ उठा रहे हैं। इसके अतिरिक्त तम्बाकू के विभिन्न उद्योगों में लाखों व्यक्ति जीविका पा रहे हैं। भारत तम्बाकू में स्वयं समृद्ध है और अपनी पैदावार का 16-17 प्रतिशत दुनिया के विभिन्न भागों को निर्यात करता है।...
