‘सावन माह में विशेष’ की कड़ी में हम आपको सावन (श्रावण) के प्रारंभ से भारत में स्थित भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के बारे में बता रहे हैं। इससे पहले, आपने प्रथम सोमनाथ, दूसरे मल्लिकार्जुन, तीसरे महाकालेश्वर, चौथे ओंकारेश्वर, पांचवें केदारेश्वर और छठें भीमाशंकर, सातवें विश्वेश्वर, आठवें त्र्यंबकेश्वर, नवें बैद्यनाथ, दसवें नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे पढ़ा।
आज आपको ग्यारहवें रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के बारे में अवगत करा रहे हैं। यह ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम द्वीप पर रामनाथ या रामेश्वरम या रामनाथस्वामी मंदिर तमिलनाडु के रामेश्वरम द्वीप पर स्थित है। भारत के उत्तर मे काशी की जो मान्यता है, वही दक्षिण में रामेश्वरम की है। माना जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना श्रीराम ने की थी, इसी वजह इसे रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से शिव जी के साथ ही श्रीराम की कृपा भी मिल जाती है।
रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति
अरुलमिगु रामनाथस्वामी मंदिर (Arulmigu Ramanathaswamy Temple) की वेबसाइट के अनुसार, रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग रामायण काल के इतिहास से जुड़ा है। पुराणों के अनुसार, ऋषि अगस्त्य की सलाह पर श्री राम, सीता और लक्ष्मण यहां आए थे। रावण को मारने से लगे ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने यहां शिवलिंग की स्थापना और पूजा की थी। कहा जाता है कि श्री राम ने इसकी स्थापना के लिए एक शुभ समय तय किया और शिवलिंग लाने के लिए आंजनेय (हनुमान) को कैलाश पर्वत भेजा। जब हनुमान समय पर वापस नहीं आ पाए, तो सीता ने खुद रेत का शिवलिंग बनाया, और जब तक हनुमान दूर कैलाश पर्वत से शिवलिंग लेकर लौटे, तब तक पूजा पूरी हो चुकी थी। हनुमान बहुत नाराज़ हो गए। उन्होंने रेत से बने प्रतिष्ठित शिवलिंग को हटाने की व्यर्थ चेष्टा की। हनुमान को शांत करने के लिए, राम ने रामलिंग के बगल में उनके लाए शिवलिंग (विश्वलिंगम) को भी प्रतिष्ठित किया और आदेश दिया कि सभी पूजा-पाठ सबसे पहले हनुमान द्वारा लाए गए विश्वलिंगम की पूजा की जाएं। इस मंदिर में, सबसे पहले भगवान विश्वनाथर की पूजा की जाती है। जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है, रामेश्वरम भगवान रामेश्वर यानी श्री राम द्वारा प्रतिष्ठित ईश्वर का पवित्र स्थान है।
12वीं सदी में बने इस मंदिर का गलियारा किसी भी हिंदू मंदिर के मुकाबले सबसे लंबा है और यह शैव, वैष्णव और स्मार्त संप्रदाय के लोगों के लिए तीर्थयात्रा का एक लोकप्रिय स्थान है। स्मार्त संप्रदाय हिंदू धर्म का एक प्रमुख संप्रदाय है जो स्मृति ग्रंथों और आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत वेदांत दर्शन पर आधारित है। इस संप्रदाय के अनुयायी किसी एक देवता को सर्वोच्च या एकमात्र न मानकर पांच प्रमुख देवताओं (शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश और सूर्य) की समान रूप से पूजा करते हैं, जिसे ‘पंचायतन पूजा’ कहा जाता है।
एक और मान्यता यह है कि शिवलिंग का निर्माण लंका जाने से पहले किया गया था। यह मंदिर और इससे जुड़ी कहानियां रामेश्वरम की लोकप्रियता का एक कारण रही हैं। रामेश्वरम भारत से श्रीलंका के सबसे करीब का स्थान भी है। भू-वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि कभी भारत इस स्थान से राम सेतु पुल के ज़रिए श्रीलंका से जुड़ा हुआ था।
रामेश्वरम मंदिर
यह मंदिर 15 एकड़ में फैला हुआ है और इसमें ऊंचे पिरामिडनुमा गोपुरम और एक विशाल नंदी प्रतिमा है। 4,000 फीट लंबे गलियारे पर 4,000 नक्काशीदार ग्रेनाइट के स्तंभ हैं – जिसे दुनिया का सबसे लंबा गलियारा कहा जाता है। गर्भगृह के अंदर दो लिंग हैं-एक जिसे राम ने रेत से बनाया था (मुख्य देवता) और दूसरा शिवलिंग जिसे हनुमान कैलाश पर्वत से लाए थे- विश्वलिंग। रामेश्वरम द्वीप के चारों ओर 64 जल निकाय या तीर्थ हैं , जिनमें से 24 को पवित्र माना जाता है और उनमें स्नान करने से पापों का नाश होता है।
यहां रामनाथस्वामी और उनकी पत्नी देवी पार्वतीवर्धिनी के लिए अलग-अलग मंदिर हैं, साथ ही भगवान विष्णु, भगवान गणेश और देवी विशालाक्षी के लिए भी मंदिर हैं। मंदिर में कई अन्य हॉल भी हैं, जैसे सेतुपति मंडपम, कल्याण मंडपम और नंदी मंडपम।
प्राप्त जानकारियों के अनुसार, यह ऐतिहासिक तीर्थस्थल 10वीं सदी ईस्वी तक एक भिक्षु की देखरेख में था। इसके बाद, 12वीं सदी ईस्वी में सीलोन (Ceylon) के राजा पराक्रमबाहु ने मंदिर के गर्भगृह का निर्माण करवाया। इसके बाद, मदुरै के एक अमीर व्यक्ति ने अम्मन सन्निधि कॉरिडोर बनवाया और मरम्मत के अन्य काम करवाए। 16वीं सदी में, मदुरै के राजा विश्वनाथ नायक के अधीन एक सरदार राजा, चिन्नौदयन सेतुपति कट्टाथेवर (Chinnaudayan Sethupathi Kattathevar) ने नंदी मंडप बनवाया और मरम्मत के अन्य काम करवाए। इस मंदिर में स्थापित नंदी की ऊंचाई 17 फ़ीट, लंबाई 22 फ़ीट और चौड़ाई 12 फ़ीट है। बाद में, सेतुपति राजाओं और नट्टुकोट्टई के लोगों ने उन समयों में कई तरह के मरम्मत और सुधार के काम किए, जब परिवहन की कोई सुविधा नहीं थी।
मंदिर की वर्तमान संरचना का निर्माण 17वीं शताब्दी ईस्वी में हुआ माना जाता है। त्रावणकोर, रामनाथपुरम, मैसूर और पुदुक्कोट्टई के कई शाही परिवारों ने मंदिर को संरक्षण दिया है और इसकी वर्तमान सुंदरता में योगदान दिया है।
चार प्रमुख शैव नयनमारों (नल्वार) में से, अप्पर स्वामीगल (तिरुनावुक्करासर) और तिरुज्ञान सम्बंदर, दोनों ने ही अपने पदों में इस मंदिर के भगवान रामनाथस्वामी की स्तुति की है। साथ ही, अरुणगिरिनाथर और मुथुस्वामी दीक्षितार जैसे कई अन्य संतों ने भी इस मंदिर के देवी-देवता की महिमा का गुणगान किया है। चार प्रमुख शैव नयनमारों (नल्वार) में से, अप्पर स्वामीगल (तिरुनावुक्करासर) और तिरुज्ञान सम्बंदर, दोनों ने ही अपने पदों में इस मंदिर के भगवान रामनाथस्वामी की स्तुति की है। दक्षिण भारत (मुख्यतः तमिलनाडु) के छठी से आठवीं शताब्दी के बीच हुए भगवान शिव के 63 महान तमिल संत और कवि थे, जिन्होंने भक्ति आंदोलन के प्रसार में अहम भूमिका निभाई। साथ ही, अरुणगिरिनाथर और मुथुस्वामी दीक्षितार जैसे कई अन्य संतों ने भी इस मंदिर के देवी-देवता की महिमा का गुणगान किया है।
पूजा और कार्यक्रम
रामेश्वरम में दर्शन से पहले 22 पवित्र कुंडों (तीर्थम) में स्नान करना जरूरी माना जाता है। मंदिर में 6 मुख्य पूजा होती है- स्फटिक लिंग दर्शन, कालशांति पूजा, उच्चिक्कल पूजा, सायंरक्षा पूजा और अर्द्धजाम। अर्द्धजाम पूजा रात को होती है, इस समय चांदी की पालकी में नटराज की शोभायात्रा होती है।
इसके अलावा, गंगाभिषेकम, पंचामृत अभिषेकम्, रुद्राभिषेक, महा रुद्राभिषेक, लघु रुद्राभिषेकजलाभिषेक, दुग्धाभिषेकनाग-दोष निवारण पूजा, संतान प्राप्ति पूजा, काल सर्प पूजा भी यहां आयोजित किए जाते हैं। महा शिवरात्रि (फरवरी-मार्च), सबसे बड़ा त्योहार है, जो 12 दिन का उत्सव होता है। रथ यात्रा, रामनवमी: भगवान राम का जन्मोत्सव, विशेष शोभा यात्रा, श्रावण मास: सावन में हर सोमवार विशेष अभिषेक और थिरुकल्याणम उत्सव: शिव-पार्वती का विवाह उत्सव, 17 दिन चलता है।
