Gangotri is a town and a Nagar Panchayat in Uttarkashi district in the state of Uttarakhand, India. It is a Hindu pilgrim town on the banks of the river Bhagirathi and origin of River Ganges. It is on the Greater Himalayan Range, at a height of 3,100 metres.
हिमालय को बचाने और उसके संरक्षण के प्रति लोगों को जागरुक करने के लिए हर साल 9 सितंबर को हिमालय दिवस मनाया जाता है। हिमालय सिर्फ पहाड़ नहीं, भारत की जीवनरेखा है-हमारी हवा, पानी, जंगल, मिट्टी और हजारों नदियों का स्रोत है। पर्यावरणविद् एवं पद्मभूषण से सम्मानित अनिल जोशी द्वारा हिमालय दिवस की शुरुआत की गई थी, ताकि हिमालय के महत्व और इसके संरक्षण के प्रति जनभागीदारी को बढ़ावा दिया जा सके।
हिमालय शब्द संस्कृत के दो शब्दों से बना है – हिम + आलय, मतलब बर्फ का घर। यह दुनिया की सबसे ऊंची और सबसे युवा पर्वत श्रृंखला है। हिमालय भारत की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत में बहुत महत्व रखता है। यह पर्वत श्रृंखला भूगोल के साथ-साथ जीव विज्ञान और संस्कृति में भी महत्वपूर्ण है। हिमालय पर्वत पश्चिम-उत्तर पश्चिम से पूर्व-दक्षिण पूर्व तक 2400 किलोमीटर तक फैला हुआ है। इसके पश्चिम में नंगा पर्वत और पूर्व में नमचा बरवा इसके आधार हैं। उत्तरी हिमालय काराकोरम और हिंदू कुश पर्वतों से घिरा हुआ है। सिंधु-त्सांगपो सिवनी एक सीमा के रूप में कार्य करती है, जो 50 से 60 किलोमीटर चौड़ी है, जो इसे उत्तरी दिशा में तिब्बती पठार से अलग करती है।
हिमालय भारत, नेपाल, भूटान, चीन (तिब्बत) और पाकिस्तान—5 देशों में फैला है। भारत में 12 राज्य हिमालय से जुड़े हैं-जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल और पूर्वोत्तर के राज्य।
हिमालय की तीन मुख्य श्रेणियां हैं।
1-वृहद हिमालय (हिमाद्रि): सबसे ऊंची श्रेणी, औसत ऊंचाई 6000 मीटर। दुनिया की सबसे ऊंची चोटियां यहीं हैं – माउंट एवरेस्ट (8848 m), K2, कंचनजंगा।
2-मध्य हिमालय (हिमाचल): 2700 से 4500 मीटर, मसूरी, नैनीताल, दार्जिलिंग जैसे हिल स्टेशन यहीं हैं।
3-शिवालिक हिमालय: सबसे बाहरी और सबसे नई श्रेणी, 900 से 1200 मीटर।
हिमालय का प्राकृतिक महत्व
गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सतलुज जैसी बड़ी नदिया हिमालय से निकलती हैं। जलवायु रक्षक के रूप में हिमालय, साइबेरिया से आने वाली ठंडी हवाओं को रोकता है और मानसून को रोककर भारत में बारिश लाता है। यह स्नो लेपर्ड, लाल पांडा, कस्तूरी मृग जैसे दुर्लभ जीवों का घर है।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व
श्रीमद्भागवत, शिव पुराण और स्कंद पुराण में हिमालय को देवताओं का पिता कहा गया है। हिंदू धर्म में हिमालय को शिव का निवास कहा गया है। हिमालय और उनकी पत्नी मैना की पुत्री हैं देवी पार्वती। इसलिए शिव जी हिमालय के दामाद हैं। इस कारण हिमालय को हिमवान भी कहते हैं। गंगा जी भी हिमालय की पुत्री हैं, इसलिए उन्हें हिमजा कहा जाता है। पुराणों में कहा गया है – “पर्वतानां हिमालयोऽस्मि” – गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, पर्वतों में मैं हिमालय हूं। केदारनाथ, बद्रीनाथ, अमरनाथ, कैलाश मानसरोवर सभी हिमालय में हैं। वेदों और पुराणों में इसे नगाधिराज-पर्वतों का राजा कहा गया है।
हिमालय को भगवान शिव का घर
जैसा कि हिमालय को भगवान शिव का घर माना जाता है। कैलाश पर्वत को शिव और पार्वती का स्थायी निवास माना जाता है। आज यह तिब्बत में है, लेकिन हर हिंदू के लिए मोक्ष का केंद्र है। 12 ज्योतिर्लिंगों में से 1—केदारनाथ हिमालय की गोद में है। पंच केदार, पंच बद्री, अमरनाथ – सभी हिमालय में ही हैं। मान्यता है कि हिमालय में तप करने से जल्दी सिद्धि मिलती है, क्योंकि यहां की हवा में ही तप है।
हिमालय की रक्षा करना धर्म की रक्षा करने के समान
हिंदू धर्म कहता है –“हिमालयं समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥” जिसका अर्थ है-हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक देवताओं ने जिस देश को बनाया, वही हिंदुस्तान है इसलिए हिमालय की रक्षा करना धर्म की रक्षा करने के समान है।
वर्ष 2010 में उत्तराखंड में आई बाढ़ और 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद प्रसिद्ध पर्यावरणविद् पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी (HESCO) ने हिमालय के लिए एक विशेष दिन की पहल की थी। 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने 9 सितंबर को आधिकारिक तौर पर हिमालय दिवस घोषित किया। साल 2015 से इसे बड़े स्तर पर मनाया जा रहा है। अब यह सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, सभी हिमालयी राज्यों में मनाया जाता है। इस दौरान, राज्य संस्थानों, स्कूलों और गैर सरकारी संगठनों द्वारा सेमिनार, प्रतिज्ञाएं, रैलियां और वृक्षारोपण अभियान जैसी गतिविधियों काआयोजन किया जाता है।
उत्तराखंड राज्य हर साल 9 सितंबर को हिमालय दिवस मनाता है
उत्तराखंड सरकार इस बार 2 सितंबर (बुग्याल दिवस) से 9 सितंबर (हिमालय दिवस) तक इसे हिमालय दिवस सप्ताह के रूप में मना रही है। वर्ष 2026 के हिमालय दिवस (9 सितंबर) की मुख्य थीम “ग्लोबल वार्मिंग और हिमालय” (Global Warming and the Himalayas) है। आज हिमालय दिवस के अवसर पर राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि हिमालय भारत की प्राकृतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। इसकी विशाल पर्वत श्रृंखलाएं, हिमनद, वन और नदियां न केवल देश की सुंदरता को समृद्ध करती हैं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन और आजीविका का आधार भी हैं। उन्होंने एक एक्स पोस्ट में आगे कहा, “हिमालय के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए हमारी सरकार इकोलॉजी और इकोनॉमी के बीच संतुलन स्थापित करते हुए पूरी प्रतिबद्धता के साथ निरंतर कार्य कर रही है। हमारा संकल्प है कि विकास के साथ-साथ हिमालय की समृद्ध जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों को भी सुरक्षित रखा जाए।”
जलवायु परिवर्तन का हिमालय पर असर
गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे तेज और सबसे खतरनाक असर हिमालय पर ही दिख रहा है। वैज्ञानिक इसे “Third Pole” कहते हैं, क्योंकि ध्रुवों के बाद सबसे ज्यादा बर्फ यहीं है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। ISRO और ICIMOD की रिपोर्ट के अनुसार हिमालय के ग्लेशियर हर साल 14-15 मीटर पीछे हट रहे हैं। गंगोत्री ग्लेशियर पिछले 80 सालों में 1.5 किमी सिकुड़ चुका है।
2100 तक हिमालय की 1/3 से 2/3 बर्फ खत्म होने का अनुमान है। वहीं, बर्फ पिघलने से पहाड़ों में नई झीलें बन रही हैं। वर्ष 2023 में सिक्किम की दक्षि ल्होनक झील फटने से तीस्ता में बाढ़ आई थी। बादल फटना, भूस्खलन, 2013 केदारनाथ, 2021 चमोली, 2023 जोशीमठ जैसी घटनाएं इसी का परिणाम हैं। सर्दियों में बर्फबारी कम, और गर्मियों में अचानक ज्यादा बारिश हो रही है।
नदियों पर संकट: गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, सिंधु—9 बड़ी नदियां हिमालय से निकलती हैं। करोड़ों लोग इन पर निर्भर हैं। पहले बर्फ पिघलने से बाढ़ आएगी, बाद में पानी की भारी कमी होगी। सर्दियों में नदियों का जलस्तर लगातार घट रहा है।
काला कार्बन: हिमालय का दुश्मन दिल्ली, पंजाब में पराली जलाने और गाड़ियों का धुआं हिमालय तक जाता है। यह बर्फ पर जम जाता है, बर्फ काली हो जाती है और सूरज की गर्मी ज्यादा सोखती है, जिससे पिघलना और तेज हो जाता है।
जीव-जंतुओं और लोगों पर असर : सेब की खेती अब 2000 मीटर से ऊपर चली गई है, नीचे सेब नहीं हो रहा। स्नो लेपर्ड, हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग ऊपर की ओर जा रहे हैं, उनका घर छोटा हो रहा है। जोशीमठ, नैनीताल जैसे शहर धंस रहे हैं क्योंकि Permafrost (जमी हुई जमीन) पिघल रही है।
नेपाल त्रासदी
26 अगस्त, 2026 को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास हिमस्खलन या ग्लेशियर के ढहने से उत्पन्न आपदा में 1,360 से अधिक लोगों की जान चली गई है और हजारों लोग अभी भी लापता हैं। आपदा अधिकारियों की प्रारंभिक रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि लेंडे घाटी में एक विशाल ग्लेशियर और चट्टान के ढहने से एक अस्थायी बांध बन गया, जो टूट गया और गाढ़ी मिट्टी और मलबे के साथ मिश्रित तेज गति वाले बाढ़ के पानी को नीचे की ओर बहा ले गया। इस आपदा ने त्रिशुली नदी के 72 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में फैलेरसुवा, नुवाकोट, धाडिंग, गोरखा और तनहुन जिलों को बुरी तरह प्रभावित किया। चीन-नेपाल सीमा पर स्थित ग्यिरोंग चौकी पूरी तरह से नष्ट हो गई। अकेले नेपाल में 1,357 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 5,000 से अधिक लोग लापता हैं। 32,000 बच्चों सहित 84,000 से अधिक लोग प्रत्यक्ष रूप से विस्थापित या प्रभावित हुए हैं।
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन से बढ़ते खतरों पर दुनिया का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि नेपाल को जलवायु परिवर्तन के कारण सामने आ रही आपदाओं की गंभीरता को दुनिया के सामने और मजबूती से रखना होगा। हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं रह गए हैं, बल्कि वे मानव जीवन, बुनियादी ढांचे और भविष्य की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं।
भारत सरकार का हिमालयी इकोसिस्टम को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय मिशन
भारत सरकार National Mission for Sustaining the Himalayan Ecosystem पर काम कर रही है। हिमालयी इकोसिस्टम के पर्यावरणीय महत्व को देखते हुए, विभाग ने एक ‘राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति (एनईसी)’ का गठन किया है, जिसमें प्रमुख हितधारकों के विभिन्न वर्गों के लोग शामिल हैं। इनमें शिक्षाविदों और अनुसंधान संगठनों के प्रतिष्ठित जलवायु वैज्ञानिक और संबंधित मंत्रालयों के प्रतिनिधि शामिल हैं। एनईसी, एनएमएसएचई के तहत समर्थित विभिन्न अनुसंधान कार्यक्रमों के कार्यान्वयन की समीक्षा और मूल्यांकन के लिए नियमित अंतराल पर बैठकें करती है। इसके अतिरिक्त, विभाग परियोजनाओं की क्षेत्र-स्तर की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों के दौरे की भी सुविधा प्रदान करता है। डीएसटी समर्थित परियोजनाओं के वैज्ञानिक परिणामों को संबंधित हितधारकों तक पहुंचाने के लिए कार्यशालाएं भी आयोजित करता है।
रुड़की में एक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना
जलवायु-प्रेरित प्राकृतिक आपदाओं, जैसे कि भूस्खलन और मिट्टी के कटाव, के प्रभाव का अध्ययन और उन्हें कम करने के लिए, विभाग ने हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की में एक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (सीओई) की स्थापना की है, जो आपदा जोखिम न्यूनीकरण, स्थिरता और अनुकूलन रणनीतियों के क्षेत्र पर केंद्रित है। इसके अलावा, डीएसटी का एक समर्पित स्वायत्त संस्थान, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (डब्लूआईएचजी), देहरादून, भू-खतरों (भूकंप, भूस्खलन), ग्लेशियोलॉजी, भू-संसाधनों आदि से संबंधित वैज्ञानिक अनुसंधान और गतिविधियों को अंजाम देता है।
इसके अलावा, शहरीकरण जैसी उभरती चुनौतियों का समाधान करने के उद्देश्य से, डीएसटी ने शहरी जलवायु पर एक राष्ट्रीय नेटवर्क कार्यक्रम का समर्थन किया है और हाल ही में ‘शहरी जलवायु अनुसंधान और चरम घटनाएं’ पर एक विशेष आह्वान की घोषणा की है, ताकि बदलते परिदृश्य में शहरी जलवायु के विभिन्न पहलुओं को वैज्ञानिक रूप से समझा जा सके। वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) ने 2021 में “संरक्षित क्षेत्रों के अंदर और आसपास इको पर्यटन दिशानिर्देश” अधिसूचित किए हैं।
इसके अतिरिक्त, पर्यटन मंत्रालय (एमओटी) ने भी एक ‘सतत पर्यटन के लिए राष्ट्रीय रणनीति’ तैयार की है, जो पर्यावरणीय स्थिरता, जैव विविधता की सुरक्षा और आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिरता को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।
व्यक्तिगत स्तर लोग क्या कर सकते हैं ?
सरकार NMSHE पर काम कर रही है, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर भी लोगों को इसका पूरा ख्याल रखना होगा। हिमालयी यात्रा में प्लास्टिक बिल्कुल न ले जाएं। स्थानीय लोगों के होमस्टे और उत्पाद को बढ़ावा दें। पेड़ लगाना नहीं, बल्कि जंगल बचाना ज्यादा जरूरी है। दरअसल, हिमालय बुखार नहीं है जो उतर जाएगा, यह एक संकेत है कि धरती बीमार है। हिमालय दिवस हमें अपने पर्यावरण के प्रति सचेत रहने और अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित करता है। यह न केवल पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वालों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में एक वैश्विक संदेश भी देता है।
