धमतरी, 10 सितंबर । छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और कृषि परंपरा से जुड़ा प्रमुख पोला पर्व गुरूवार को शहर सहित ग्रामीण अंचल में उत्साह और उमंग के साथ मनाया गया। पर्व पर घर-आंगन में विशेष सजावट के साथ पशुधन की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि और अच्छी फसल की कामना की गई। वहीं बच्चों ने मिट्टी से बने नांदिया बैलों को सजाकर उन्हें दौड़ाया और पारंपरिक खेलों का आनंद लिया।
पर्व के अवसर पर घरों में छत्तीसगढ़ी व्यंजनों की खुशबू भी बिखरी रही। ठेठरी, खुरमी सहित विभिन्न पकवान तैयार किए गए, जिनका परिवार के सदस्यों और मेहमानों ने मिलकर स्वाद लिया। पोला पर्व की तैयारियां ग्रामीण क्षेत्रों में एक दिन पहले से ही शुरू हो गई थीं। पर्व की पूर्व संध्या से ही बैगाओं की टोलियां गांवों में घूमती नजर आईं। उन्होंने पारंपरिक रीति-रिवाज के अनुसार ग्राम देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना कर अच्छी बारिश, बेहतर फसल और गांव की खुशहाली की कामना की। मान्यता है कि भादो माह में खेती-किसानी के प्रमुख कार्य पूरे होने के बाद धान की फसल में बालियां आने लगती हैं।
खेतों में लहलहाती फसल को देखकर किसान उत्साहित होते हैं और अच्छी उपज की उम्मीद के साथ पोला पर्व मनाते हैं। कृषि प्रधान समाज में इस पर्व का विशेष महत्व है, क्योंकि इसमें खेती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बैल और अन्य पशुधन के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। अंचल के अधिकांश गांवों में वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार पोरा पटकने के लिए निर्धारित स्थल बनाए गए थे। इन स्थानों पर ग्रामीणों ने पारंपरिक रीति-रिवाज निभाने के साथ विभिन्न आयोजन किए। पुरुषों के साथ बड़ी संख्या में महिलाएं और युवतियां भी पर्व के उत्साह में शामिल हुईं। कई स्थानों पर खो-खो सहित पारंपरिक खेलों का आयोजन हुआ, जिसमें महिलाओं और युवतियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
पंडित राजकुमार तिवारी का कहना है कि पोला पर्व का महत्व केवल पूजा और पकवानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परिवार और समाज को एकजुट करने वाली परंपरा भी है। ग्रामीण जीवन में यह पर्व मेल-मिलाप और आपसी भाईचारे का अवसर बनता है। पर्व के बाद अब अंचल में तीजा की तैयारियां शुरू हो गई हैं। छत्तीसगढ़ की परंपरा के अनुसार तीजा मनाने के लिए बेटियां और बहनें मायके पहुंचती हैं। यही वजह है कि पोला से ही परिवारों में अगले पर्व को लेकर उत्साह नजर आने लगा है।
