दुनिया के नेता जलवायु संकट से निपटने के उपायों पर एक सप्ताह तक चलने वाली वार्ता के लिए जुटे हैं। इस दौरान अक्षय ऊर्जा के तेजी से विस्तार को जलवायु परिवर्तन से निपटने की उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी का पर्यावरण लगातार दबाव में है और इसे सुधारने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है।
बैठक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते इस्तेमाल और उसके लिए जरूरी डेटा सेंटरों के विस्तार पर भी चर्चा हो रही है। डेटा सेंटर बड़ी मात्रा में बिजली और पानी का इस्तेमाल करते हैं। विशेषज्ञ इस बात पर विचार कर रहे हैं कि AI जहां जलवायु संकट को बढ़ाने में योगदान दे सकता है, वहीं इसका इस्तेमाल जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भी किया जा सकता है।
हर साल संयुक्त राष्ट्र महासभा और न्यूयॉर्क जलवायु सप्ताह के दौरान वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी और उससे जुड़े मुद्दों पर चर्चा होती है। हालांकि, विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं का कहना है कि चर्चाओं की तुलना में ठोस कार्रवाई अभी भी सीमित है।
पृथ्वी की सुरक्षित सीमाओं पर बढ़ता दबाव
विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं के अनुसार, इस बार AI और डेटा सेंटरों का तेजी से बढ़ता प्रभाव जलवायु चर्चा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ईरान और यूक्रेन में जारी युद्धों के कारण जीवाश्म ईंधन की कीमतों में बदलाव और एशिया में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी बढ़ती आपदाएं भी इस चर्चा को प्रभावित कर रही हैं।
जर्मनी के पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के निदेशक जोहान रॉकस्ट्रॉम ने कहा कि पृथ्वी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि मानवीय गतिविधियां पृथ्वी की स्थिरता, लचीलेपन और जीवन को बनाए रखने वाली प्राकृतिक प्रणालियों के लिए जोखिम बढ़ा रही हैं।
संस्थान की Planetary Boundaries Science Lab की नई रिपोर्ट के अनुसार, स्वस्थ पृथ्वी के लिए तय की गई नौ पर्यावरणीय सीमाओं में से सात को पार किया जा चुका है।
ब्रिटेन के विदेश मंत्री एड मिलिबैंड ने स्वच्छ और अक्षय ऊर्जा की ओर बदलाव को राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकता बताया।
संयुक्त राष्ट्र के जलवायु प्रमुख साइमन स्टील ने कहा कि जलवायु परिवर्तन खाद्य कीमतों और महंगाई को बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता का असर दुनिया भर में अरबों लोगों पर पड़ रहा है।
AI: चुनौती भी और समाधान का साधन भी
विशेषज्ञों ने AI को लेकर दोहरे प्रभाव की ओर ध्यान दिलाया है। एक तरफ AI और उससे जुड़े डेटा सेंटरों की भारी बिजली खपत प्रदूषण और उत्सर्जन बढ़ा सकती है। दूसरी तरफ AI का इस्तेमाल जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी किया जा सकता है।
AI के जरिए मौसम और जलवायु संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण, ऊर्जा के इस्तेमाल को बेहतर बनाना और पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं को समझने जैसे क्षेत्रों में मदद मिल सकती है। हालांकि, इस खबर के स्रोत में इन संभावित इस्तेमालों का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है।
इस बीच, अक्षय ऊर्जा क्षमता में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। वर्ष 2025 में दुनियाभर में 693 गीगावाट नई अक्षय ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई। इसके बावजूद जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल भी बढ़ा।
विशेषज्ञों का कहना है कि 2030 तक वैश्विक अक्षय ऊर्जा क्षमता को तीन गुना करने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए मौजूदा गति को और तेज करना होगा।
अक्षय ऊर्जा से बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने में मदद मिल रही है, लेकिन तेल, कोयले और गैस के इस्तेमाल में अभी वह कमी नहीं आई है, जिसकी जरूरत जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए बताई जा रही है।
