रेबीज उन संक्रामक बीमारियों में शामिल है, जिनसे बचाव के प्रभावी उपाय विज्ञान ने विकसित कर लिए हैं, फिर भी दुनिया के अनेक हिस्सों में यह मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है। इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके लक्षण प्रकट होने के बाद यह लगभग शत-प्रतिशत घातक होती है, जबकि संक्रमण के बाद समय पर उचित उपचार शुरू कर दिया जाए तो इसके कारण होने वाली मृत्यु को पूरी तरह रोका जा सकता है। यही विरोधाभास रेबीज को सार्वजनिक स्वास्थ्य की एक महत्वपूर्ण चुनौती बनाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया के 150 से अधिक देशों और क्षेत्रों में रेबीज का जोखिम मौजूद है और हर वर्ष लगभग 59 हजार लोगों की मृत्यु इस बीमारी के कारण होती है, जिनमें बड़ी संख्या बच्चों की होती है। हर वर्ष 28 सितंबर को विश्व रेबीज दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 की थीम “Stronger Together”, यानी “मिलकर अधिक मजबूत”, रेबीज की रोकथाम में सामूहिक प्रयासों के महत्व को रेखांकित करती है। यह केवल स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य और पशु स्वास्थ्य के बीच समन्वय, स्थानीय प्रशासन की सक्रियता, पशु चिकित्सकों की भूमिका और समुदाय की भागीदारी से जुड़ा व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान है। रेबीज की रोकथाम का आधार भी स्पष्ट है। कुत्तों का व्यापक टीकाकरण, पशुओं के साथ सुरक्षित व्यवहार, काटे जाने या खरोंच लगने की स्थिति में घाव की तत्काल सफाई और बिना विलंब चिकित्सकीय सलाह के अनुसार पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (PEP) शुरू करना। वैज्ञानिक उपायों और जन-जागरूकता के समन्वित प्रयासों से रेबीज से होने वाली अधिकांश मौतों को रोका जा सकता है।
रेबीज क्या है और यह इतना घातक क्यों है?
रेबीज एक विषाणुजनित जूनोटिक बीमारी है, जो मुख्य रूप से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है। संक्रमित पशु की लार के माध्यम से वायरस मनुष्य के शरीर में प्रवेश करता है। सामान्यतः संक्रमित पशु के काटने या खरोंचने से संक्रमण फैलता है। खुले घाव अथवा आंख, नाक या मुंह जैसे श्लेष्मा झिल्ली के संक्रमित लार के संपर्क में आने से भी संक्रमण का खतरा हो सकता है। संक्रमण के बाद वायरस धीरे-धीरे तंत्रिका तंत्र की ओर बढ़ता है। शुरुआती अवस्था में बुखार, बेचैनी, दर्द या काटे गए स्थान के आसपास असामान्य झुनझुनी, चुभन या जलन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इसके बाद बीमारी मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करने लगती है। कुछ मरीजों में उत्तेजना, बेचैनी, भ्रम और पानी निगलने में कठिनाई जैसे लक्षण दिखाई देते हैं, जबकि कुछ मामलों में धीरे-धीरे लकवा और कोमा की स्थिति बन सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक बार चिकित्सकीय लक्षण विकसित हो जाने के बाद रेबीज का परिणाम लगभग हमेशा घातक होता है। इसलिए रेबीज की वास्तविक लड़ाई लक्षण आने के बाद उपचार करने के बजाय संक्रमण को बीमारी में बदलने से पहले रोकने की है।
लुई पाश्चर से आधुनिक रेबीज नियंत्रण तक
रेबीज के इतिहास में फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुई पाश्चर का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने रेबीज के विरुद्ध वैक्सीन विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया और 1885 में एक बच्चे पर रेबीज वैक्सीन का सफल प्रयोग किया गया। इस वैज्ञानिक उपलब्धि ने ऐसी बीमारी के विरुद्ध मानवता को एक प्रभावी सुरक्षा उपाय दिया, जिसे उस समय लगभग निश्चित मृत्यु का कारण माना जाता था। आज रेबीज की रोकथाम के लिए आधुनिक सेल-कल्चर आधारित वैक्सीन उपलब्ध हैं। विज्ञान की प्रगति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि रेबीज से होने वाली अधिकांश मानव मौतों को रोका जा सकता है। चुनौती अब वैक्सीन की खोज से अधिक उसकी समय पर उपलब्धता, सही उपयोग, पशु टीकाकरण, जन-जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच सुनिश्चित करने की है।
मानव रेबीज में कुत्तों की केंद्रीय भूमिका
रेबीज अनेक स्तनधारी जीवों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन मानव रेबीज के संदर्भ में कुत्तों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। WHO के अनुसार मानव रेबीज के लगभग 99 प्रतिशत मामलों में संक्रमण का स्रोत कुत्ते होते हैं। यही कारण है कि मानव रेबीज को नियंत्रित करने की सबसे प्रभावी रणनीति कुत्तों में बीमारी के प्रसार को रोकना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक कुत्ता रेबीज से संक्रमित होता है या हर कुत्ते के काटने से रेबीज हो जाएगा। लेकिन संभावित जोखिम को नजरअंदाज करना गंभीर गलती हो सकती है। किसी पशु के काटने या खरोंचने की स्थिति में व्यक्ति को यह तय करने के बजाय कि पशु स्वस्थ दिखाई दे रहा है या नहीं, तत्काल चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
बच्चे क्यों हैं अधिक संवेदनशील?
रेबीज का एक महत्वपूर्ण सामाजिक पक्ष बच्चों से जुड़ा है। WHO के अनुसार वैश्विक स्तर पर रेबीज से होने वाली मौतों में लगभग 40 प्रतिशत पीड़ित 15 वर्ष से कम आयु के बच्चे होते हैं। बच्चे अक्सर पशुओं के व्यवहार को समझ नहीं पाते और खेलते समय कुत्तों के बहुत करीब चले जाते हैं। इसके अलावा बच्चों में सिर और गर्दन के आसपास काटे जाने का जोखिम भी अधिक हो सकता है, जिससे स्थिति गंभीर हो सकती है। इसलिए विद्यालयों, परिवारों और समुदायों में बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि अनजान कुत्ते या दूसरे पशु के पास जाने, उसे छेड़ने, भोजन करते समय परेशान करने या उसके बच्चों के साथ खेलने से बचें। बच्चों को यह भी बताया जाना चाहिए कि पशु के काटने या खरोंचने की घटना को छिपाना नहीं है, बल्कि तुरंत माता-पिता, शिक्षक या किसी जिम्मेदार व्यक्ति को बताना है।
कुत्ते के काटने पर पहला कदम क्या होना चाहिए?
रेबीज की रोकथाम में काटे जाने के बाद के शुरुआती मिनट अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। WHO के अनुसार घाव को साबुन और बहते पानी से लगभग 15 मिनट तक अच्छी तरह धोना चाहिए। इसके बाद व्यक्ति को तत्काल स्वास्थ्य केंद्र जाकर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। घाव पर मिट्टी, मिर्च, तेल, राख, चूना या किसी अन्य घरेलू पदार्थ को लगाने जैसी पारंपरिक धारणाएं नुकसान पहुंचा सकती हैं और उपचार में देरी कर सकती हैं। घाव को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि चोट छोटी है या खून कम निकला है। किसी संभावित संक्रमित पशु के काटने या खरोंचने के बाद समय गंवाना सबसे बड़ी भूल हो सकती है। चिकित्सक जोखिम का आकलन करके तय करते हैं कि वैक्सीन, रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन या अन्य उपचार की आवश्यकता है या नहीं।
पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस : संक्रमण के बाद जीवन रक्षक सुरक्षा
रेबीज से बचाव में पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस यानी PEP महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें घाव का उचित प्रबंधन, आवश्यकतानुसार रेबीज वैक्सीन और कुछ गंभीर प्रकार के संपर्क में रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन शामिल हो सकते हैं। WHO के अनुसार उचित घाव प्रबंधन और गुणवत्तापूर्ण PEP की समय पर उपलब्धता मानव रेबीज से होने वाली मृत्यु को लगभग पूरी तरह रोक सकती है। यहां एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेश यह है कि व्यक्ति को अपने स्तर पर यह तय नहीं करना चाहिए कि उसे टीका चाहिए या नहीं। उपचार का निर्णय प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी द्वारा एक्सपोजर की प्रकृति और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।
कुत्तों का टीकाकरण : समस्या के स्रोत पर नियंत्रण
मानव रेबीज से बचाव की सबसे प्रभावी रणनीतियों में से एक बड़े पैमाने पर कुत्तों का टीकाकरण है। जब कुत्तों में वायरस का प्रसार कम होता है तो मनुष्यों तक संक्रमण पहुंचने की संभावना भी घटती है। WHO mass dog vaccination को रेबीज नियंत्रण का प्रमाणित और लागत-प्रभावी उपाय मानता है। इस दृष्टि से केवल लोगों को वैक्सीन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। यदि बीमारी का स्रोत पशु आबादी में बना रहता है तो मानव स्वास्थ्य व्यवस्था पर लगातार दबाव बना रहेगा। इसलिए पशु टीकाकरण और मानव PEP को एक ही सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति के दो महत्वपूर्ण हिस्सों के रूप में देखना होगा।
पालतू पशु पालने की जिम्मेदारी
पालतू कुत्ता रखना केवल भावनात्मक लगाव का विषय नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। नियमित टीकाकरण, पशु चिकित्सक से स्वास्थ्य जांच, सुरक्षित तरीके से पशु को रखना और उसके व्यवहार पर ध्यान देना जिम्मेदार पशु-पालन का हिस्सा है। पालतू पशु के टीकाकरण का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना भी उपयोगी है। यदि वह किसी व्यक्ति को काटता है तो चिकित्सक के लिए पशु के टीकाकरण की जानकारी महत्वपूर्ण हो सकती है। साथ ही, पशु के व्यवहार में अचानक बदलाव दिखाई देने पर उसे गंभीरता से लेना चाहिए और पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
आवारा कुत्ते और सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती
शहरीकरण और मानव बस्तियों के विस्तार के साथ आवारा कुत्तों की आबादी का प्रबंधन कई नगर निकायों के सामने चुनौती है। इस समस्या का समाधान केवल कुत्तों को हटाने तक सीमित नहीं हो सकता। प्रभावी रेबीज नियंत्रण के लिए कुत्तों का टीकाकरण, वैज्ञानिक आबादी प्रबंधन, कचरा प्रबंधन और समुदाय की भागीदारी आवश्यक है। Animal Birth Control जैसे कार्यक्रमों और बड़े पैमाने पर एंटी-रेबीज टीकाकरण को सार्वजनिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण से प्रभावी तरीके से लागू करना जरूरी है। साथ ही पशु कल्याण और मानव सुरक्षा दोनों को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक तथा मानवीय व्यवस्था विकसित करनी होगी।
भारत में रेबीज : बड़ी चुनौती और बदलती रणनीति
भारत में रेबीज नियंत्रण का महत्व विशेष है। WHO के भारत संबंधी उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान के 2024 में प्रकाशित अनुमानों के आधार पर देश में हर वर्ष लगभग 91 लाख पशु-काटने की घटनाएं होती हैं, जिनमें तीन-चौथाई से अधिक मामले कुत्तों से जुड़े हैं। इसी अनुमान में हर वर्ष लगभग 5,726 मानव रेबीज मौतों का उल्लेख किया गया है। भारत सरकार ने मानव स्वास्थ्य और पशु स्वास्थ्य के समन्वित प्रयासों के लिए National Rabies Control Programme (NRCP) तथा National Action Plan for dog-mediated Rabies Elimination (NAPRE) जैसी पहलें शुरू की हैं। NCDC के अनुसार राष्ट्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में एंटी-रेबीज वैक्सीन और आवश्यक परिस्थितियों में एंटी-रेबीज सीरम/इम्युनोग्लोबुलिन की उपलब्धता, निगरानी व्यवस्था, जागरूकता, मॉडल एंटी-रेबीज क्लीनिक और कुत्तों से होने वाले रेबीज उन्मूलन की दिशा में गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। भारत के लिए चुनौती केवल उपचार उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों और दूरदराज के इलाकों तक समय पर PEP पहुंचाने, पशु टीकाकरण बढ़ाने, सही आंकड़े जुटाने और समुदाय को जागरूक करने की भी है।
One Health : मानव और पशु स्वास्थ्य को साथ देखने की जरूरत
रेबीज इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि मानव स्वास्थ्य को पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य से अलग करके नहीं देखा जा सकता। यही One Health दृष्टिकोण का मूल आधार है। एक ओर चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी काटे गए व्यक्ति को PEP उपलब्ध कराते हैं, तो दूसरी ओर पशु चिकित्सक संक्रमित या संदिग्ध पशुओं की पहचान, निगरानी और टीकाकरण में भूमिका निभाते हैं। स्थानीय निकाय कुत्तों की आबादी और टीकाकरण कार्यक्रमों का प्रबंधन करते हैं। समुदाय पशु व्यवहार, काटने की घटनाओं और उपचार की जानकारी साझा करता है। इस प्रकार रेबीज नियंत्रण में स्वास्थ्य विभाग, पशुपालन विभाग, नगर निकाय, पशु चिकित्सक, शिक्षण संस्थान, गैर-सरकारी संगठन और आम नागरिक सभी की भूमिका जुड़ जाती है।
सर्विलांस और तकनीक की बढ़ती भूमिका
रेबीज नियंत्रण में विश्वसनीय आंकड़े अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि पशु काटने की घटनाओं और रेबीज से होने वाली मौतों की सही जानकारी उपलब्ध नहीं होगी तो संसाधनों का सही वितरण और जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान कठिन हो जाएगी। भारत में निगरानी को मजबूत करने के लिए डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है। NCDC के अनुसार National Rabies Control Programme के तहत Integrated Disease Surveillance Programme पोर्टल के माध्यम से कुत्ते के काटने और रेबीज से होने वाली मौतों की मासिक रिपोर्टिंग को मजबूत किया गया है। भविष्य में डिजिटल रिकॉर्ड, जोखिम मानचित्रण, मोबाइल आधारित रिपोर्टिंग और पशु टीकाकरण की बेहतर ट्रैकिंग से नियंत्रण कार्यक्रमों को और प्रभावी बनाया जा सकता है।
भूटान से मिली महत्वपूर्ण सीख
रेबीज उन्मूलन की संभावना को लेकर हाल का एक उल्लेखनीय उदाहरण भूटान है। सितंबर 2026 में WHO ने भूटान को dog-mediated human rabies को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त करने वाला देश प्रमाणित किया। WHO के अनुसार वहां जून 2023 से कुत्तों से फैलने वाले रेबीज से मानव मृत्यु दर्ज नहीं हुई है। इस उपलब्धि के पीछे लंबे समय तक चलाया गया कुत्ता टीकाकरण, आबादी प्रबंधन, निगरानी और समुदाय आधारित One Health प्रयास रहा। भूटान का अनुभव यह बताता है कि रेबीज उन्मूलन केवल एक बार का अभियान नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली व्यवस्था का परिणाम है। टीकाकरण, निगरानी और समुदाय की भागीदारी को निरंतर बनाए रखना आवश्यक है।
2030 का लक्ष्य और सामूहिक प्रयास
विश्व स्तर पर “Zero by 30” का लक्ष्य dog-mediated human rabies के कारण होने वाली मानव मौतों को वर्ष 2030 तक समाप्त करने की दिशा में केंद्रित है। इसके लिए तीन प्रमुख स्तंभ महत्वपूर्ण हैं। कुत्तों का व्यापक टीकाकरण, मानवों के लिए समय पर PEP और समुदाय में जागरूकता। यह लक्ष्य महत्वाकांक्षी अवश्य है, लेकिन रेबीज की विशेषता यह है कि इसे रोकने के लिए आवश्यक वैज्ञानिक साधन पहले से उपलब्ध हैं। इसलिए चुनौती नई चिकित्सा खोज से अधिक उपलब्ध साधनों को अंतिम व्यक्ति और अंतिम पशु आबादी तक पहुंचाने की है।
जन-जागरूकता ही सबसे मजबूत सुरक्षा कवच
रेबीज के खिलाफ लड़ाई में जन-जागरूकता की भूमिका किसी वैक्सीन से कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को यह पता ही नहीं कि काटे जाने के बाद घाव को तुरंत धोना है और स्वास्थ्य केंद्र जाना है, तो उपलब्ध चिकित्सा व्यवस्था का लाभ समय पर नहीं मिल पाएगा। इसी तरह यदि पालतू पशु मालिक नियमित टीकाकरण नहीं कराता या समुदाय कुत्तों के सामूहिक टीकाकरण अभियान में सहयोग नहीं करता तो संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ना कठिन होगा। विद्यालयों में बच्चों को पशुओं के सुरक्षित संपर्क के बारे में बताया जा सकता है। मीडिया, सोशल मीडिया, पंचायतों, नगर निकायों और स्वास्थ्य संस्थानों के माध्यम से स्थानीय भाषाओं में सरल संदेश पहुंचाए जा सकते हैं। जागरूकता का उद्देश्य भय पैदा करना नहीं, बल्कि सही समय पर सही कदम उठाने की क्षमता विकसित करना होना चाहिए।
सामूहिक प्रयासों से रेबीज-मुक्त भविष्य की ओर
रेबीज मानव स्वास्थ्य की उन चुनौतियों में से है, जिसके समाधान की दिशा विज्ञान ने काफी हद तक स्पष्ट कर दी है। यह बीमारी लक्षण प्रकट होने के बाद लगभग हमेशा घातक है, लेकिन संक्रमण के बाद समय पर और उचित PEP से मृत्यु को रोका जा सकता है। मानव रेबीज के अधिकांश मामलों में कुत्तों की भूमिका होने के कारण कुत्तों का बड़े पैमाने पर टीकाकरण इस बीमारी के उन्मूलन की केंद्रीय रणनीति बनता है। विश्व रेबीज दिवस 2026 की थीम “Stronger Together” इसी सामूहिक जिम्मेदारी को रेखांकित करती है। रेबीज के खिलाफ सफलता तभी स्थायी होगी, जब मनुष्य, पशु और पर्यावरण को एक साझा स्वास्थ्य तंत्र के रूप में देखा जाए। सरकारें प्रभावी नीतियां बनाएं, स्वास्थ्य संस्थान PEP की उपलब्धता सुनिश्चित करें, पशु चिकित्सक और स्थानीय निकाय कुत्तों के टीकाकरण को गति दें तथा नागरिक जिम्मेदार पशु-पालन और जागरूकता में भागीदार बनें। रेबीज के खिलाफ सबसे प्रभावी संदेश यही है कि काटे जाने के बाद इंतजार नहीं, तत्काल कार्रवाई जरूरी है; केवल मनुष्य का उपचार नहीं, बल्कि संक्रमण के स्रोत पर नियंत्रण भी आवश्यक है। वैज्ञानिक उपाय, सामाजिक जागरूकता और सामूहिक भागीदारी साथ आएं तो रेबीज को इतिहास का हिस्सा बनाना संभव है। यही विश्व रेबीज दिवस का वास्तविक उद्देश्य और “मिलकर अधिक मजबूत” होने का सार है। यह आलेख वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज एवं सफदरजंग अस्पताल, नई दिल्ली के मेडिसिन विभाग के सीनियर प्रोफेसर डॉ. अश्वनी राय से हुई विस्तृत बातचीत और उनके दीर्घ चिकित्सकीय अनुभव पर आधारित है।
