हिम तेंदुआ, जिसे अंग्रेजी में Snow Leopard कहा जाता है, हिमालय के बर्फीले पहाड़ों में पाया जाने वाला एक अत्यंत सुंदर, शांत और दुर्लभ वन्य जीव है। इसे “पहाड़ों का भूत” भी कहा जाता है, क्योंकि यह बर्फ में इस तरह घुल-मिल जाता है और इसे देखना बहुत मुश्किल होता है। इसके संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए हर वर्ष 23 अक्टूबर को “अंतर्राष्ट्रीय हिम तेंदुआ दिवस” (International Day of the Snow Leopard) मनाया जाता है।
हिम तेंदुआ (पैंथेरा अनसिया) एशिया के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है। यह एक विशिष्ट और पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण प्रजाति है, जो अफगानिस्तान, भूटान, चीन, भारत, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, मंगोलिया, नेपाल, पाकिस्तान, रूसी संघ, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान सहित कई पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है। हिम तेंदुए की मजबूत शारीरिक बनावट उसे विशाल और खड़ी ढलानों पर आसानी से चढ़ने में सक्षम बनाती है। उसके पिछले पैर उसे अपने शरीर की लंबाई से छह गुना अधिक छलांग लगाने की क्षमता देते हैं। उसकी लंबी पूंछ फुर्ती प्रदान करती है, संतुलन बनाए रखती है और आराम करते समय हिम तेंदुए के शरीर को ठंड से बचाती है। हजारों सालों से यह शानदार बिल्ली पहाड़ों की बादशाह रही है।
यूनाइटेड नेशन की वेबसाइट के अनुसार, 2024 में, जनरल असेंबली ने 23 अक्टूबर को ‘अंतर्राष्ट्रीय हिम तेंदुआ दिवस’ (International Day of the Snow Leopard) के रूप में घोषित किया। इसका उद्देश्य हिम तेंदुए के संरक्षण के प्रयासों में अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है, क्योंकि समग्र पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) में इसकी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। महासभा ने जैव विविधता में आई अभूतपूर्व वैश्विक गिरावट से निपटने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया। इसमें संकटग्रस्त प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाना, उनके संरक्षण की स्थिति में सुधार करना और उसे बनाए रखना, तथा ऐसे पारिस्थितिक तंत्रों (ecosystems) को बहाल करना और सुरक्षित रखना शामिल है जो पानी, स्वास्थ्य, आजीविका और कल्याण से जुड़ी आवश्यक सेवाएं और कार्य प्रदान करते हैं।
इतिहास और शुरुआत
इस दिवस की शुरुआत 2013 में किर्गिस्तान के बिश्केक शहर में हुई थी। वहां 12 देशों ने मिलकर हिम तेंदुओं की सुरक्षा के लिए “बिश्केक घोषणापत्र” पर हस्ताक्षर किए थे। भारत भी उन देशों में से एक है। इसी ऐतिहासिक घोषणा की याद में 23 अक्टूबर को यह दिवस मनाया जाता है।
हिम तेंदुआ हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह ऊंचाई पर रहने वाला शीर्ष शिकारी है, जो प्रकृति का संतुलन बनाए रखता है। यह मुख्य रूप से भारत के लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में पाया जाता है।
देश में हिम तेंदुओं की कुल अनुमानित संख्या 718
सरकार ने देशव्यापी हिम तेंदुए की गणना पूरी कर इसे आधिकारिक रूप से भारत में हिम तेंदुए की संख्या का आकलन (एसपीएआई) नाम दिया गया। यह गणना 2019 से 2023 के बीच की गई थी और इसके निष्कर्ष 30 जनवरी, 2024 को जारी किए गए। पहले एसपीएआई के निष्कर्षों के अनुसार, देश में हिम तेंदुओं की कुल अनुमानित संख्या 718 है। सबसे अधिक संख्या लद्दाख (477) में दर्ज की गई, उसके बाद उत्तराखंड (124), हिमाचल प्रदेश (51), अरुणाचल प्रदेश (36), सिक्किम (21) और जम्मू-कश्मीर (9) का स्थान रहा। एसपीएआई भारत में हिम तेंदुओं की संख्या का पहला व्यवस्थित, वैज्ञानिक आकलन है और इसमें लगभग 1,20,000 वर्ग किलोमीटर के अधिक-ऊंचाई वाले आवास को शामिल किया गया है, जो प्रजाति के संभावित क्षेत्र के 70 प्रतिशत से अधिक का प्रतिनिधित्व करता है।
दो चरणों वाली एक कठोर प्रणाली का पालन किया गया
11 दिसंबर 2025 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने एक बयान बताया कि इस अभ्यास में दो चरणों वाली एक कठोर प्रणाली का पालन किया गया, जिसमें स्थानिक वितरण का मानचित्रण करने के लिए अधिवास-आधारित नमूनाकरण और स्तरीकृत क्षेत्रों में कैमरा-ट्रैप-आधारित प्रचुरता अनुमान को संयोजित किया गया। कुल मिलाकर, सर्वेक्षण टीमों ने संकेतों के सर्वेक्षण के लिए 13,450 किलोमीटर के अनुप्रस्थ मार्ग पर पैदल यात्रा की और 1,971 स्थानों पर कैमरा ट्रैप लगाए, जिससे लगभग 1,80,000 ट्रैप नाइट्स के दौरान 241 विशिष्ट हिम तेंदुओं की पहचान की गई।
इस प्रयास का समन्वय देहरादून के भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) द्वारा हिम तेंदुए के सभी रेंज राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों और स्थानीय स्तर के गैर सरकारी संगठनों जैसे संरक्षण भागीदारों की सम्मेलन के साथ किया गया। दूसरा चक्र, अर्थात् एसपीएआई 2.0, केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) द्वारा वन्यजीव सप्ताह 2025 में हिम तेंदुए, उसके आवास और संबंधित प्रजातियों के संरक्षण को और मजबूत करने के लिए एक सुदृढ़ ढांचे के साथ शुरू किया गया है।
चिह्नित प्रजातियों के लक्षित संरक्षण के लिए वित्तीय सहायता
मंत्रालय, केंद्र प्रायोजित वन्यजीव पर्यावास विकास योजना के प्रजाति पुनर्प्राप्ति कार्यक्रम के अंतर्गत राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेश प्रशासनों को चिन्हित प्रजातियों के लक्षित संरक्षण के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है। हिम तेंदुआ इस कार्यक्रम के अंतर्गत चिन्हित 24 प्रजातियों में से एक है। एसपीएआई मंत्रालय की अनुवर्ती संरक्षण कार्य योजना का आधार प्रदान करता है, जो अधिक-ऊंचाई वाले भूभागों में जनसंख्या निगरानी को मजबूत करने, संरचित वैज्ञानिक आकलन और सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने पर ध्यान देती है।
राष्ट्रीय हिम तेंदुआ इकोसिस्टम संरक्षण प्राथमिकताएं (एनएसएलईपी) के तहत, एमओईएफसीसी ने हिम तेंदुए के संरक्षण के लिए कई प्रमुख कार्यों को प्राथमिकता दी है। एमओईएफसीसी ने हिम तेंदुआ परियोजना (पीएसएल) के निर्माण और शुभारंभ के लिए राज्यों और कई एजेंसियों के साथ परामर्श प्रक्रिया शुरू की। अधिक-ऊंचाई वाले हिमालयी इकोसिस्टम की रक्षा, हिम तेंदुए जैसे लुप्तप्राय वन्यजीवों के संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आजीविका में सुधार के लिए एक पहल, सिक्योर हिमालय भी शुरू की गई है।
हिम तेंदुआ हिमालय की सबसे दुर्लभ और सुंदर प्रजातियों में से एक है। इसकी संख्या दुनिया भर में मात्र 4000 से 6500 ही बची है। इसे बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
हिम तेंदुए को खतरा क्यों है ?
अवैध शिकार: इसकी सुंदर खाल और हड्डियों के लिए शिकार किया जाता है।
आवास का नुकसान: सड़क, पर्यटन और निर्माण से इसका घर खत्म हो रहा है।
जलवायु परिवर्तन: बर्फ पिघलने से इसका ठंडा इलाका कम हो रहा है।
शिकार की कमी: भेड़-बकरियों और जंगली बकरियों की कमी से उसे भोजन नहीं मिलता।
मानव-वन्यजीव संघर्ष-जब यह गांव की भेड़-बकरियों को खा जाता है, तो लोग उसे मार देते हैं।
संरक्षण के लिए सरकारी प्रयास
भारत सरकार ने इसे बचाने के लिए विशेष योजना शुरू की। हिमाचल प्रदेश, लद्दाख, उत्तराखंड, सिक्किम में संरक्षित क्षेत्र: हेमिस नेशनल पार्क (लद्दाख) हिम तेंदुओं का सबसे बड़ा घर है। Snow Leopard Population Assessment: 2024 में भारत ने पहली बार वैज्ञानिक तरीके से इनकी गिनती की। वहीं, बिश्केक घोषणा पत्र (2013) ने 12 देशों ने मिलकर इसकी सुरक्षा का वादा किया।
हम क्या कर सकते हैं ?
वन्यजीवों के अवैध शिकार और तस्करी का विरोध करें।स्थानीय लोगों को जागरूक करें कि हिम तेंदुआ हमारी धरोहर है।पर्यावरण को साफ रखें, प्लास्टिक और प्रदूषण कम करें। इको-टूरिज्म को बढ़ावा दें ताकि स्थानीय लोगों को हिम तेंदुए से फायदा हो।यदि आप हिमालय घूमने जाएं तो वहां के नियमों का पालन करें।
प्रोजेक्ट स्नो लेपर्ड
भारत सरकार ने हिम तेंदुए को बचाने के लिए प्रोजेक्ट स्नो लेपर्ड (Project Snow Leopard) शुरू किया है। इसके साथ ही हेमिस नेशनल पार्क, लद्दाख जैसे संरक्षित क्षेत्रों में इनकी सुरक्षा की जा रही है। भारत में वन्यजीवों के लिए सशक्त कानून हैं और हिम तेंदुए को संरक्षण का सर्वोच्च दर्जा प्राप्त है, अर्थात् वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अंतर्गत अनुसूची-I में रखा गया है। हिम तेंदुए के प्राकृतिक आवासों के क्षरण को रोकने के लिए मंत्रालय की रणनीति दीर्घकालिक, विज्ञान-आधारित प्रबंधन पर केंद्रित है।
हिमाचल प्रदेश में शीत रेगिस्तान जीवमंडल अभ्यारण्य की घोषणा जैसे प्रयास, जिसे यूनेस्को के विश्व जीवमंडल अभ्यारण्य नेटवर्क में शामिल किया गया है, नंदादेवी समुद्री सीमा और कंचनजंगा समुद्री सीमा के अतिरिक्त सहभागी दृष्टिकोण के माध्यम से 7770 वर्ग किलोमीटर हिम तेंदुए के आवास को सुरक्षित करते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिम तेन्दुओं की सुरक्षा और संरक्षण अधिक ऊंचाई वाले इकोसिस्टम का दीर्घकालिक संरक्षण संरक्षित क्षेत्रों के विस्तार और बेहतर प्रबंधन, भू-भाग स्तर पर संरक्षण योजना, समुदाय-आधारित प्रबंधन कार्यक्रमों और आवास क्षरण को रोकने के उपायों के माध्यम से किया जा रहा है, जिसे वैज्ञानिक निगरानी और अंतर-एजेंसी समन्वय का समर्थन प्राप्त है।
वहीं, क्षेत्रीय स्तर पर ‘रेंज स्टेट’ (range State) सहयोग, सीमा-पार दृष्टिकोणों, और बहु-साझेदार पहलों, सम्मेलनों तथा तंत्रों के परिणामों के लिए कई क्षेत्रीय पहलें मौजूद हैं, जिनमें शामिल कुछ प्रमुख पहले इस प्रकार हैं-
सऊदी अरब और पैंथेरा की ‘अरेबियन लेपर्ड पहल’ (Arabian Leopard Initiative)- इसकी शुरुआत 2019 में हुई थी। इस 10-वर्षीय और 2 करोड़ डॉलर की ऐतिहासिक साझेदारी का उद्देश्य गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered) ‘अरेबियन लेपर्ड’ को प्राकृतिक आवास में पुनर्जीवित करना और जंगलों में इनकी संख्या बढ़ाना है।
‘ग्लोबल स्नो लेपर्ड एंड इकोसिस्टम प्रोटेक्शन प्रोग्राम’- ग्लोबल स्नो लेपर्ड एंड इकोसिस्टम प्रोटेक्शन प्रोग्राम (GSLEP) हिम तेंदुओं और उनके पर्वतीय आवासों के संरक्षण के लिए 2013 में बनाया गया दुनिया का पहला अंतर-सरकारी गठबंधन है। भारत सहित 12 देशों के समूह वाला यह कार्यक्रम पारिस्थितिकी संतुलन और हिम तेंदुए की लुप्तप्राय प्रजाति को बचाने के लिए काम करता है।
रूसी संघ में हिम तेंदुए के संरक्षण की रणनीति- भारत ने 26 अगस्त, 2026 को रूस के मॉस्को स्थित रूसी विज्ञान अकादमी के ए.एन. सेवेर्तसोव पारिस्थितिकी और विकास संस्थान में आयोजित हिम तेंदुए के अध्ययन और संरक्षण पर रूस-भारत गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया। यह सम्मेलन अंतरक्षेत्रीय संघ ‘इरबिस’ और अंतर्राष्ट्रीय बिग कैट एलायंस (आईबीसीए) के बीच दिसंबर 2025 में हस्ताक्षरित साझेदारी समझौते के प्रारूप के अंतर्गत आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य हिम तेंदुए के अनुसंधान और संरक्षण में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत बनाना है।
नेपाल की हिम तेंदुआ संरक्षण कार्य योजना 2024-2030 और हिम तेंदुआ एवं पारिस्थितिकी तंत्र प्रबंधन योजना 2017-2026।
भूटान की ‘स्नो लेपर्ड कंजर्वेशन एक्शन प्लान 2024–2034’ — जो हिम तेंदुए के संरक्षण के लिए जलवायु-एकीकृत लैंडस्केप दृष्टिकोण अपनाती है,
2017 का ‘बिश्केक घोषणापत्र’-जिसका शीर्षक “हिम तेंदुओं और पर्वतों की देखभाल: हमारा पारिस्थितिक भविष्य” है – जिस पर हिम तेंदुओं के आवास वाले 12 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें मध्य एशिया के सभी पांच देश शामिल हैं।
पर्यावरण सहयोग के लिए उत्तर-पूर्व एशियाई उप-क्षेत्रीय कार्यक्रम की प्रकृति संरक्षण रणनीति, जिसमें अमूर टाइगर, अमूर तेंदुआ और हिम तेंदुआ जैसी प्रमुख प्रजातियों का संरक्षण शामिल है और अंतर्राष्ट्रीय टाइगर फोरम।
हिम तेंदुआ हिमालय की सबसे दुर्लभ और सुंदर प्रजातियों में से एक है। इसकी संख्या दुनिया भर में मात्र 4000 से 6500 ही बची है। इसे बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। हिम तेंदुआ बचेगा तो हिमालय का संतुलन बचेगा। यह केवल जानवर नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण के स्वास्थ्य का प्रतीक है। इसलिए इस दिवस पर हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि हम इस दुर्लभ प्राणी की रक्षा करेंगे और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे सुरक्षित रखेंगे।
