भारत की स्वतंत्रता एक लंबे संघर्षों की कहानी है। आज़ादी के लिए न जाने कितने फांसी के फंदे में झूले थे और न जाने कितनो ने गोली खाई थी तब जाकर हमने यहाँ आज़ादी पाई है देश ऋणी है उन क्रांति वीरो का जिन्होंने देश को गुलामी की जंजीरो से मुक्त कराने के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया परन्तु दुःख है इतिहास में कुछ खास लोगो को ही जग मिली कुछ लोग जिनके नाम इतिहास के पन्नों में खो गए है त्याग , बलिदान और आज़ादी के लिए किये गए लम्बे संघर्षो के बाद स्वतंत्र भारत में भी वह सामान और पहचान नहीं पा सके जिसके वे हक़दार थे स्वाधीनता संग्राम में वीरो के साथ साथ इनमें वीरांगनाये भी थी जिन्होंने न केवल क्रांतिकारियों की हर तरह से सहायता की बल्कि संगठनों व सभाओ का नेतृत्व भी किया उन्ही वीरांगनाओ में एक थी मातंगिनी हाजरा एक अद्भुत महिला और भारतीय क्रांतिकारी थीं। उन्होंने अपना जीवन अंग्रेज़ी शासन से देश को आज़ाद करने के लिए समर्पित कर दिया। अपने दुबले शरीर के बावजूद वे आज़ादी की लड़ाई में कभी पीछे नहीं हटीं।
मातंगिनी हाजरा के शुरुआती जीवन के बारे में हमें अधिक ज्ञान नहीं है। हम केवल इतना जानते हैं, कि वे 1869 में तामलुक (पश्चिम बंगाल राज्य में स्थित एक जगह) के निकट होगला गाँव में पैदा हुई थीं। एक गरीब किसान की बेटी होने के कारण, वे शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाईं। छोटी उम्र में ही उनका विवाह कर दिया गया था और अट्ठारह साल की उम्र में वे विधवा भी हो गईं। उसके पश्चात वे अपने गाँव वापस लौट आईं और उन्होंने अपना सारा समय और ध्यान, अपने समुदाय के लोगों की मदद करने में लगाया। 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में राष्ट्रवादी आंदोलन की शुरुआत हुई, जब गांधी जी ने खुद देशवासियों में जागरूकता फैलाने और उन्हें आज़ादी की लड़ाई लड़ने के लिए प्रेरित करने हेतु इस क्षेत्र का दौरा किया। 1905 में मिदनापुर की इस वीरांगना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से हिस्सा लेना शुरू कर दिया। कहा जाता है, कि आज़ादी के संघर्ष में इस क्षेत्र की महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत महत्वपूर्ण थी।
1932 में, उन्होंने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और नमक सत्याग्रह में उनकी भूमिका के लिए उन्हें गिरफ़्तार भी किया गया। हालाँकि उन्हें जल्द ही रिहा भी कर दिया गया था, लेकिन वे नमक पर लगाए गए शुल्क वापिस लेने की अपनी माँग को लेकर दृढ़ता से बनी रहीं। उन्हें छह माह के लिए फिर से गिरफ़्तार कर लिया गया और बेहरामपुर जेल में डाल दिया गया। 1933 में उन्होंने सेरमपुर में एक उपखंड कांग्रेस सम्मेलन में भाग लिया, जिसमें पुलिस द्वारा लाठीचार्ज में वे घायल हो गईं। उनका दृढ़ संकल्प कुछ इस प्रकार का था, कि वे कई बार कारावास होने के बावजूद अपनी लड़ाई में दृढ़ता से खड़ी रहीं।
हाजरा को स्वतंत्रता का एक जोशीला समर्थक माना जाता है। 1933 की एक घटना में, हाजरा चिलचिलाती गर्मी की एक दोपहर में अपने ज़िले में आयोजित एक स्वतंत्रता मार्च में हिस्सा ले रही थीं। इनका गंतव्य स्थान राज्यपाल का महल था, जो स्वयं अपने छज्जे में अडिगता से खड़े हुए, इस मार्च को तटस्थ रूप से देख रहे थे। ऐसा लग रहा था, मानो वहाँ कोई क्रिकेट मैच या कोई देशी अनुष्ठान चल रहा हो। मातंगिनी परेड के अग्र-दल में, स्वतंत्रता ध्वज को ऊँचा लहराते हुए आगे बढ़ रही थीं। जैसे ही वे राज्यपाल के छज्जे के करीब पहुंची, वे अचानक घेरे के बीच से, सैनिकों से बच कर, अपने बैनर को घुमाते हुए आगे बढ़ीं। इस दौरान वे चिल्लाती रहीं, “वापस जाओ, लाट साहिब”। इस निर्भीक प्रदर्शन के लिए हाजरा को अंग्रेज़ी पुलिस द्वारा पीटा गया जिसके कारण उन्हें गहरी चोटें आईं।
29 सितम्बर 1942 को उन्होंने करीब 6000 विरोधियों के एक बड़े जुलूस का नेतृत्व किया, जो 73 वर्षीय हाजरा की निर्भीकता और जोशीले स्वभाव का प्रमाण देता है। इनमें से अधिकतर महिलाएँ थीं, जो अंग्रेज़ी शासन से तामलुक पुलिस थाने को वापस लेना चाहती थीं। पुलिस ने जुलूस को रोकने की कोशिश की, और इस अफ़रा-तफ़री के बीच हाजरा ने पुलिस से विरोधियों पर गोलियाँ न चलाने का आग्रह किया। उनकी गुहार की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया और उन पर तीन बार गोलियाँ चलाई गईं। इसके बावजूद वे प्रदर्शन में आगे बढ़ती रहीं, जब तक कि उनके शरीर ने अपने प्राण नहीं त्याग दिए।
