महाराणा संग्राम सिंह जिनकी लोक जीवन में प्रसिद्धि “राणा साँगा” के नाम से है । एक ऐसे महा यौद्धा थे जिनका पूरा जीवन राष्ट्र, संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा के लिये समर्पित रहा । उनका जन्म 12 अप्रैल 1484 को हुआ था । राणा सांगा राजपूतों के सिसोदिया उप वर्ग से संबंधितथे जो सूर्यवंशी क्षत्रियों की एक शाखा है । राणा संग्राम सिंह सुप्रसिद्ध विजेता राणा कुंभा के पौत्र और राणा रायमल के पुत्र थे । उन्होंने 1509 में चित्तौड़ की गद्दी संभाली इसके साथ ही विदेशी आक्रमणकारियों से मुकाबला और आक्रमणकारियों द्वारा छल बल से स्थापित की गई सत्ता को उखाड़ फेकने का अभियान आरंभ हुआ । उन्होंने छै बड़े युद्ध किये । और सभी जीते । एक युद्ध तो ऐसा जीता जिसमें गुजरात, दिल्ली और मालवा के सुल्तानों ने एक संयुक्त मोर्चा बना कर तीन तरफ से चित्तौड पर धावा बोला । पर राणा सांगा अपनी वीरता से तीनों को पराजित किया । उस समय दिल्ली की गद्दी पर इब्राहिम लोदी का शासन था । महाराणा जी ने सिकंदर लोदी के समय ही दिल्ली के कई क्षेत्रों अधिकार कर लिया था । आगरा क्षेत्र सल्तनत से छीनकर अपना ध्वज फहरा दिया था । इसका बदला लेने सिकंदर लोदी के उत्तराधिकारी इब्राहिम लोदी ने 1517 में मेवाड़ पर धावा बोला । यह युद्ध कोटा क्षेत्र के खातोली नामक स्थान पर हुआ जिसमें महाराणा सांगा की विजय हुई। खातोली की पराजय का बदला लेने के लिए इब्राहीम लोदी ने 1518 में फिर एक बड़ी सेना भेजी । और पुनः पराजित होकर भागा । लोदी ने मालवा के शासक सुल्तान मोहम्मद को आक्रमण के लिये उकसाया । राणा जी ने माण्डु के शासक सुलतान को बन्दी बना लिया था परंतु उसने दया की याचना की, आधीनता स्वीकार की तो राणा जी ने उन्होंने उदारता दिखाते हुए उसे मुक्त कर दिया और उसका राज्य लौटा दिया था। पर कुछ शर्तों के साथ ।
