यह जौहर महारानी दुर्गावती की अगुवाई में हुआ। महारानी दुर्गावती मेवाड़ के सुप्रसिद्ध योद्धा राणा संग्राम सिंह की बेटी थी। इतिहास की कुछ पुस्तकों में उनकी बहन भी लिखा है। वे चित्तौड़ के सिसोदिया वंश की बेटी थी। स्वाभिमान और स्वत्व रक्षा उनके रक्त की प्रत्येक बूँद में था। शस्त्र चलाना भी जानती थीं। चित्तौड़ में उन्होंने वीराँगनाओं की टोली गठित की थी। उनका विवाह रायसेन के शासक शीलादित्य के साथ हुआ था।
शीलादित्य ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर के भाई थे। शीलादित्य ने खानवा के युद्ध में राणा संग्राम सिंह के साथ बाबर का मुकाबला किया था। खानवा के युद्ध में भारतीय शासकों का भारी नुकसान हुआ था। खानवा युद्ध के बाद बाबर ने कालिंजर पर धावा बोला और गुजरात के सुल्तानों ने मालवा और रायसेन पर। गुजरात के हमलावर रायसेन के किले को जीत तो न सके पर सैन्य शक्ति बहुत कमजोर हो गई थी। कमजोर शक्ति के बाद भी रायसेन में शीलादित्य की सत्ता बनी रही। तब रायसेन जीतने और लूटने के लिये गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने कुटिल योजना बनाई। वह धार आया। उसने नालछा में कैंप किया और अनेक भेंट रायसेन भेजी। महाराजा शीलादित्य को मित्रता संदेश भेजकर धार आमंत्रित किया और धोखे से कैद कर लिया। उन दिनों रायसेन की सीमा उज्जैन तक लगती थी। उज्जैन में शीलादित्य के भाई लक्ष्मण सिंह किलेदार थे। उन्हें यह समाचार मिला तो वे अपनी सेना लेकर रायसेन की रक्षा के लिये चल दिये। यह समाचार बहादुरशाह को मिला। वह बंदी शीलादित्य को साथ लेकर उज्जैन आया और बंदी शालादित्य को आगे करके उज्जैन पर धावा बोल दिया।
5 मई से जौहर तैयारी आरंभ हुई और 6 मई 1532 को सूर्योदय के साथ अग्नि की लपटें धधक उठीं। किले में जितनी स्त्रियाँ थीं सबने अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ अग्नि में प्रवेश कर लिया। अग्नि की लपटें आसमान छूने लगीं। जौहर की यह अग्नि दिनभर प्रज्जवलित रहीं। स्वाभिमानी क्षत्राणियों और उनके सहयोगी सभी स्त्रियों ने समर्पण करने की बजाय बलिदान होने को प्राथमिकता दी। यह रायसेन के इतिहास में पहला जौहर हुआ। इसके बाद दो और जौहर का उल्लेख मिलता है।
अगले दिन 7 मई प्रातः लक्ष्मण सिंह की कमान में निर्णायक युद्ध हुआ और अपनी रक्षा सैन्य टुकड़ी सहित बलिदान हुये। अंत में दस मई को बहादुर शाह का रायसेन के किले पर आधिपत्य हो गया।
इतिहास की कुछ पुस्तकों में शीलादित्य का नाम सलहदी और लक्ष्मण सिंह का नाम लक्ष्मण सेन लिखा है। कुछ ने यह भी लिखा है कि बहादुर शाह ने शीलादित्य को धोखे से बंदी बनाकर धर्मान्तरण करके नाम सलाहुद्दीन कर दिया था। पर बात सही नहीं लगती। यह बात सल्तनकाल के इतिहासकारों ने मन से जोड़ी होगी। चूँकि यदि शीलादित्य धर्मान्तरण कर लेते तो जौहर क्यों होता। साका क्यों होता। जो हो पर रायसेन के किले में इस जौहर का शिलालेख है। आज भी उस स्थल पर स्थानीय नागरिक जाकर शीश नवाते हैं।
लेखक: रमेश शर्मा
