- हिंदी हमारे राष्ट्र की अभिव्यक्ति का सरलतम स्रोत है।
- जीना अपने ही मैं एक महान कर्म है।
- यदि स्वर्ग कही है पृथ्वी पर, तो वह नारी उर के भीतर;
मादकता जग में अगर कहीं, वह नारी अधरों में डूबकर;
यदि कहीं नरक है इस भू, पर तो वह भी नारी के अंदर। - जीने का हो सदुपयोग यह मनुष्य का धर्म है।
- प्रकृति से प्यार करना आपको सुखी जीवन की तरफ बढ़ा देता है।
- वियोगी होगा पहला कवि , आह से उपजा होगा गान;
उमड़ कर आंखों से चुपचाप वहीं होगी कविता अनजान। - ज्ञानी बनकर मत नीरस उपदेश दीजिए।
लोक कर्म भाव सत्य प्रथम सत्कर्म कीजिए। - वह सरल, विरल, काली रेखा तम के तागे सी जो हिल-डुल;
चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल। - मैं मौन रहा,
फिर सतह कहां
बहती जाओ, बहती जाओ
बहती जीवन धारा में
शायद कभी लौट आओ तुम। - मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोए थे,
सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे।
रुपयों का कलदार मधुर फसलें खनकेंगी
फूल फलकर मैं मोटा सेठ बनूंगा।
पर बंजर धरती में एक ना अंकूर…
सुमित्रानंदन पंत जी की 2 विशेष रचनाएं
भारत माता
दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन,
अधरों में चिर नीरव रोदन,
युग युग के तम से विषण्णा मन,
वह अपने घर में
प्रवासिनी।
तीस कोटि संतान नग्न तन,
अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्र जन,
मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,
नत मस्तक
तरु तल निवासिनी!
स्वर्ण शस्य पर-पदतल लुंठित,
धरती सा सहिष्णु मन कुंठित,
क्रंदन कंपित अधर मौन स्मित,
राहु ग्रसित
शरदेंदु हासिनी।
चिंतित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित,
नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित,
आनन श्री छाया शशि उपमित,
ज्ञान मूढ़
गीता प्रकाशिनी!
सफल आज उसका तप संयम,
पिला अहिंसा स्तन्य सुधोपम,
हरती जन मन भय, भव तम भ्रम,
जग जननी
जीवन विकासिनी!
ज्योति भारत
सुमित्रानंदन पंत की कविताएं आपकी जीवनशैली में साकारत्मक बदलाव कर सकती हैं, सुमित्रानंदन पंत जी की कविताओं की श्रेणी में एक कविता “ज्योति भारत” भी है, जो कि मातृभूमि के प्रति आस्था और सम्मान के भाव पर आधारित है।
ज्योति भूमि,
जय भारत देश!
ज्योति चरण धर जहाँ सभ्यता
उतरी तेजोन्मेष!
समाधिस्थ सौंदर्य हिमालय,
श्वेत शांति आत्मानुभूति लय,
गंगा यमुना जल ज्योतिर्मय
हँसता जहाँ अशेष!
फूटे जहाँ ज्योति के निर्झर
ज्ञान भक्ति गीता वंशी स्वर,
पूर्ण काम जिस चेतन रज पर
लोटे हँस लोकेश!
रक्तस्नात मूर्छित धरती पर
बरसा अमृत ज्योति स्वर्णिम कर,
दिव्य चेतना का प्लावन भर
दो जग को आदेश!
