वर्धा । महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में भारतीय दर्शन महासभा के 95वें अधिवेशन तथा एशियाई दर्शन सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश की कुलपति आचार्य नीरजा अरुण गुप्ता ने कहा कि आज की उपलब्धि, सफलता पीढि़यों की है जिन्होंने इस देश को गढ़ा है। हमारा दायित्व है कि इसी ईमानदारी से अगली पीढी़ के लिए हम देश को गढ़ें। हमें नई पीढ़ी को ध्यान में रखते हुए उस पारिस्थितिकी का निर्माण करना है जिसमें देश प्रश्नों के साथ नहीं अपितु उत्तर के साथ खड़ा हो सके। उन्होंने कहा कि हम कृत्रिम को भौतिक बना रहे हैं। उन्होंने भाषा और विचार की स्वतंत्रता की आवश्यकता जताते हुए मूल की स्थापना करने पर बल दिया।
वर्धा के सांसद रामदास तडस ने कहा कि महात्मा गांधी और आचार्य विनोबा भावे की कर्मभूमि वर्धा ने शांति और अहिंसा का संदेश दिया है। आज़ादी के आंदोलन का केंद्र रहा वर्धा शहर हिंदी विश्वविद्यालय के कारण देश में नई उंचाई प्राप्त कर रहा है। उन्होंने कहा कि गांधी जी के शांति और अहिंसा के विचार से भारत महाशक्ति और महागुरु बनने की दिशा में अग्रसर हो रहा है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल ने कहा कि पारिस्थिततिकी का पुनर्स्थापन कैसे संभव होगा इसपर सोचने की आवश्यकता है। आज पूरी दुनिया एक महामारी की चपेट में है और ऐसे में दुनिया भारत की ओर देख रही है। इस दृष्टि से हमारी जिम्मेदारी अधिक बढ़ जाती है। नमामी गंगे परियोजना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इससे अनेक लोगों के जीवन में परिवर्तन आया है। यह परिवर्तन केवल भौतिक की नहीं, इसका आस्था और श्रद्धा से भी संबंध है। उन्होंने कहा कि दुनिया के समक्ष स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के प्रश्न आ रहे हैं और इसके उत्तर दार्शनिक दृष्टि से खोजने की आवश्यकता है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह अधिवेशन पारिस्थितिकी का कायाकल्प करने की दृष्टि देगा। यह आयोजन हमारी सनातन स्थिति को प्राप्त करने का यत्न है।
कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मधुसुदन पेन्ना ने कहा कि दर्शन एक तिजोरी है इनमें से जिसे जितना चाहे हम निकाल सकते हैं। गोंडवाना विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. प्रशांत बोकारे ने भारत को वेद, पुराण और संतों की प्रस्थान त्रयी बताते हुए कहा कि भारत तत्वज्ञान की भूमि रही है और संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम आदि ने इसे भलीभाति सिंचित किया है। उन्होंने गांधी के सत्य के प्रयोग, विनोबा जी के मधुकर और जे. सी. कुमारप्पा की पुस्तक एकॉनामी ऑफ पर्मनंस का उदाहरण देते हुए इसका संबंध तत्वज्ञान से जोड़ा। प्रकृति और मानव के संबंध को रेखांकित करते हुए उन्होंने दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद का जिक्र अपने वक्तव्य में किया।
भारतीय दर्शन महासभा के साधारण अध्यक्ष आचार्य एल. पी. सिंह ने सम्मेलन के मुख्य विषय ‘स्वतंत्रता एवं उत्तरदायित्व’ तथा ‘पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन के लिए दर्शन’ पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के कारण भौतिक विकास तो हुआ है परंतु हमारे सांस्कृतिक मूल्यों एवं शांति तथा अहिंसा को लेकर गंभीर स्थिति पैदा हुई है। ऐसी स्थिति में हमें एक सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाने की दृष्टि से सोचना होगा और आधुनिक पीढी में सृजनात्मकता, सहिष्णुता, शांति और अहिंसा का बीजारोपण करना होगा। उन्होंने कहा कि हिंदू, बौद्ध और सुफीजम की मूल्य पद्धति हमें प्रकृति के साथ सौहार्दपूर्ण जीवन जिने की कला की सीख देती है।
त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमांडू, नेपाल के आचार्य गोविंद शरण उपाध्याय ने कहा कि भारत और नेपाल आपस में संस्कृति और धर्म को साझा करते हैं। वैदिक संस्कृति की धाराएं बौद्ध, जैन संस्कृति से विकसित हुई हैं। उन्होंने बताया कि नेपाल के लक्ष्मी प्रसाद ने गांधी जी को ट्रेजरर ऑफ फिलासफी कहा था। भारतीय दर्शन महासभा की कार्य समिति के अध्यक्ष आचार्य एस. आर. भट्ट ने दर्शन को विश्व कल्याण के लिए पुनर्जिवित करने पर बल देते हुए कहा कि हमें राजनैतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ बौद्धिक स्वतंत्रता की तथा इसके साथ उत्तरदायित्व की भी आवश्यकता है।
भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के सदस्य सचिव आचार्य सच्चिदानंद मिश्र ने कहा कि प्रज्ञा और विवेक का जोड़ दर्शन के लिए मार्गदर्शन का काम करती है। उन्होंने कहा कि दर्शन के केंद्र में संस्कृत प्रमुख भाषा है। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के दर्शन पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने विचारों को भारतीय भाषाओं का वस्त्र पहनकर प्रस्तुत करने का आग्रह किया।
कार्यक्रम का प्रारंभ दीप-दीपन, संस्कृत, जैन और बुद्ध मंगलाचरण, भारत वंदना तथा कुलगीत से किया गया। मंचासीन अतिथियों का स्वागत सूतमाला, शॉल एवं ग्रंथ भेंट कर किया गया। स्वागत वक्तव्य प्रतिकुलपति प्रो. हनुमानप्रसाद शुक्ल ने दिया। इस अवसर पर स्मारिका तथा मीडिया समय के विशेषांक विमोचन अतिथियों के द्वारा किया गया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. रोमसा शुक्ला ने किया तथा आभार विश्वविद्यालय के कुलसचिव क़ादर नवाज़ ख़ान ने माना। इस अवसर पर देश-विदेश के विद्वान अतिथि, प्रतिनिधि, विश्वविद्यालय के अधिष्ठातागण, अध्यापक, शोधार्थी, शहर के गणमान्य नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
