भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के महान नेता और साहित्यकार थे। वह विधायक और राज्य सभा के सांसद भी रहे ।
डॉ. खूबचंद बघेल का हमेशा से सामाजिक कुरीतियों को देखकर खून खौल उठता था वे हमेशा इन बुराइयों को समाज से दूर करने के लिए बहुत सारे प्रयास किये जिसके फलस्वरूप उन्हें अनेकों बार समाज के गुस्से का सामना करना पड़ा है।
पुरे देश की तरह छत्तीसगढ़ में छुआछूत, ऊँच- नीच की भावना व्याप्त थी उसी की कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत किये गए हैं। बात तब की है जब गांवों के नाई, सतनामी समाज के लोगों के बाल काटने को राजी नहीं होते थे इस व्यथा को देखकर सेठ स्व. अनंत राम बर्छिहा जी ने उनके बाल काटे और दाढ़ी भी बनाई इसी से क्षुब्ध होकर कुर्मी समाज ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया, जिसे डॉ. साहब ने देखकर “ऊँच-नीच” नामक नाटक की रचना कर प्रदर्शन किया, जिसके प्रभाव से ही बर्छिहा जी का सामाजिक बहिष्कार को रद्द किया गया।
डॉ. खूबचंद बघेल द्वारा सामाजिक उत्थान के लिए चलाये गए प्रसिद्ध आंदोलन
- पंक्ति तोड़ो आंदोलन: छत्तीसगढ़ में व्याप्त एक कुप्रथा थी की शादी में समाज के आधार पर पंक्ति निर्धारित होती थी उसी पंक्ति में बैठकर भोजन करना होता था,जैसे मैं अगर कुर्मी समाज का हूँ तो सिर्फ कुर्मी समाज के पंक्ति में बैठकर भोजन कर सकता हूँ अगर अन्य किसी पंक्ति में बैठना मेरे लिए अपराध था। इसी कुरीति को तोड़ने के लिए डॉ. खूबचंद बघेल जी ने पंक्ति तोड़ो आंदोलन शुरू किया जिसका परिणाम आज आप लोगों के सामने है की सब अब मिल जुलकर किसी भी पंक्ति में भोजन कर पा रहे हैं।
- किसबिन नाच हेतु “भारतवंशी,जातीय सम्मलेन” : किसबिन नाच किसबा जाति द्वारा किया जाने वाला एकपुश्तैनी धंधा था जिसमें किसबा जाति के पुरुष अपने बहन-बेटियों को विभिन्न त्यौहारों में तवायफों जैसे नचवाने और गँवाने का काम किया करते थे। इस चलन को बंद करने के लिए डॉ. बघेल जी द्वारा समाज सुधार की दृस्टि से “भारतवंशी जातीय सम्मलेन” का आयोजन मुंगेली में कराया गया जिसका असर किसबा जाति पर पड़ा और वे सब सामाजिक मुख्य धारा में लौट आये।
डॉ. खूबचंद बघेल ने डॉक्टरी की नौकरी छोड़कर देश की आजादी में गांधी जी के आह्वान पर योगदान दिया था। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के आंदोलन के लिए 1967 से 69 तक आंदोलन का अलख जगाया।
छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वप्नदृष्टा
डॉ. बघेल महात्मा गांधी के विचारों से काफी प्रभावित थे। उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ गांधीजी से जुड़ने का फैसला किया और साल 1930 में गांधीजी के आंदोलन से जुड़ गए। 1942 में उन्हें भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पहली बार गिरफ्तार किया गया। इसके बाद उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। आजादी के बाद उन्होंने 1951 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और आचार्य कृपलानी के साथ ‘किसान मजदुर प्रजा पार्टी’ से जुड़ गए। डॉ. बघेल को छत्तीसगढ़ का प्रथम स्वप्नदृष्टा भी कहा जाता है।
