स्वस्थ जीवन की कुंजी महर्षि पतंजलि का आष्टांग योग
ये तथ्य हम सब जानते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। ‘कुमारसंभवम’ में महाकवि कालिदास ने भी कहा है कि “शरीरमाध्यम खलु धर्म साधमन” अर्थात शरीर ही सभी धर्मों (कर्त्तव्यों) को पूरा करने का एकमात्र साधन है। किंतु शरीर व मन स्वस्थ हो तभी हम लक्ष्य की तरफ बढ़ पाएंगे। ऐसे में महर्षि पतंजलि का आष्टांग योग हमें मानव जीवन के उद्देश्य को सार्थक करने की दिशा देता है।
आजकल पूरे विश्व में योग की लहर चली है। हर तीसरा व्यक्ति यह कहता हुआ मिल जाता है कि मैं भी योग करता हूं। योग सिखाने वाले पर्याप्त मिल जाएंगे, जो योग का अर्थ केवल आसन, प्राणायाम व ध्यान से लेते हैं। वस्तुतः ऋषि पतंजलि ने योग के आठ अंग बताए हैं, जिन्हें हम आष्टांग योग कहते हैं, जो यम-नियम का पालन करते हुए आसन, प्राणायाम करते प्रत्याहार को साधते, धारणा, ध्यान, समाधि के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग है।
योग शब्द संस्कृत भाषा की युज धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है जोड़ना। भारतीय संस्कृति में जीवन का अंतिम लक्ष्य निहित है, ईश्वर से साक्षात्कार या ईश्वर से जुड़ना अर्थात आत्मा का परमात्मा से मिलन, जिसे ही मोक्ष कहा गया है। अंततः हम कह सकते हैं कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने की कला को योग कहा गया है। हमारे यहां तपस्वियों ने साधना करके योग के अनेक मार्ग खोजे, जो क्रमशः प्रेम योग, भक्ति योग, सांख्य योग, कर्म योग, हठ योग, मंत्र योग, कुंडलिनी योग और राजयोग हैं।
राजयोग ही ऋषि पतंजलि द्वारा प्रदान किया आष्टांग योग है। इसमें आठ अंग हैं-(1) यम, (2) नियम, (3) आसन, (4)प्राणायाम, (5)प्रत्याहार, (6)धारणा, (7)ध्यान, (8)समाधि।
आजकल योग का आशय लोग केवल योगासन, प्राणायाम व ध्यान समझते हैं। जबकि योगासन से पूर्व यम-नियम का पालन करने से जीवन मे सात्विकता व मानसिक शांति आती है। आष्टांग योग के आठों अंगों का हमारे ऊपर अद्भुत प्रभाव पड़ता है।
यम- इसका पहला नियम यम है। यम का अर्थ है दुखों से छूटना। यम एक सामाजिक अनुशासन है। समाज में रहते हुए हमारा आचरण कैसा हो, यह हमें यम सिखाता है। यम के पांच विभाग हैं- (1)अहिंसा (2)सत्य (3)अस्तेय (4) ब्रह्मचर्य (5) अपरिग्रह।
नियम- जिस तरह यम सामाजिक अनुशासन है, उसी प्रकार नियम व्यक्तिगत अनुशासन है। आत्मा से परमात्मा के मिलन के मार्ग में सड़क को स्वयं को शुद्ध, निर्मल व पवित्र रखते हुए व्यवहार करना होता है। इसके लिए पांच प्रमुख नियम हैं-(1) शौच (2)संतोष (3)तप (4)स्वाध्याय (5)ईश्वर प्राणिधान।
आसन- इसके बाद आता है आसन। स्थिर रहते हुए लंबे समय तक सुखपूर्वक प्रसन्न मुद्रा में बैठना ही आसन कहलाता है। जब हम आसन करते हैं तो विभिन्न अंगों की मांसपेशियों में खिंचाव, दवाब या मरोड़ की प्रक्रिया होती है। फलस्वरूप रक्त संचार में वृद्धि होती है। ऑक्सीजन युक्त रक्त से उपस्थित पोषक तत्वों कोशिकाओं व उत्तकों में बढ़ती है। अंगों की कार्यक्षमता बढ़ने से हमें स्वास्थ्य लाभ होता है। वैसे तो आसनों की संख्या बहुत है, किंतु प्रत्येक व्यक्ति के स्वस्थ रहने के लिए 14 प्रमुख आसन हैं-(1)ताड़ासन (2)त्रिकोणासन (3) पार्श्व कोणासन (4)उत्तानासन (5)शीर्षासन (6) भुजंगासन (7) बद्ध कोणासन (8) अर्द्ध मत्स्येन्द्रासन (9) मरिच्यासन (10) नौकासन (11) जठर परिवर्तनासन (12) सर्वागासन (13) पश्चिमोत्तानासन (14) शवासन।
प्राणायाम- इसके पश्चात बारी आती है प्राणायाम की। प्रत्येक प्राणी जन्म से मृत्यु तक जीवन की महत्वपूर्ण क्रिया करता है, वह है श्वास (हवा अंदर लेना) व उच्छ्वास (हवा को बाहर निकलना)। मृत्यु होने पर श्वासोच्छवास की क्रिया बंद हो जाती है। इसके माध्यम से ही प्राण शक्ति सभी अंगों तक पहुंचती है। जीवन में प्राण का स्त्रोत श्वास ही है। इसकी गति ठीक प्रकार से चलती रहे, इसके लिए श्वास पर नियंत्रण आवश्यक है। परमपिता परमेश्वर ने सभी प्राणियों को उनकी आयु श्वास के रूप में प्रदान की है। विभिन्न जीवों की आयु इस बात पर निर्भर करती है कि वह वह श्वसन किस पद्धति से कितने समय में करता है। उदाहरण के लिए कुत्ता एक मिनट में 30 से 32 बार श्वास लेता है और उसकी आयु 14 से 15 वर्ष होती है। वहीं कछुआ 1 मिनट में 4 से 5 ही श्वास लेता है, इसलिए उसकी आयु 200 से 400 वर्ष होती है। इसका अर्थ ये है कि जो प्राणी दीर्घ श्वास लेता है, उसकी आयु लम्बी होती है। आष्टांग योग में इसे प्राणायाम के रूप में स्पष्ट किया गया है। प्राणायाम का वैज्ञानिक महत्व है। इससे शुद्ध वायु हमारे अंदर पहुंचती है। दीर्घ श्वास लेने से श्वास की संख्या पर हमारा नियंत्रण हो जाता है, जिससे आयु बढ़ती है। प्राणायाम द्वारा शरीर मे ऑक्सीजन की मात्रा में वृद्धि होने स्वास्थ्य वृद्धि होती है। शरीर में टॉक्सिन की मात्रा कम होती है। नित्य प्राणायाम करने वालों को कैंसर जैसे रोग भी दूर से प्रणाम कर निकल जाते हैं।
प्रत्याहार- प्राणायाम के बाद आता है प्रत्याहार। इंद्रियों का अपने-अपने विषयों से संबंध विच्छेद हो जाने पर चित्त के स्वरूप का अनुकरण करना ही प्रत्याहार है। इसे सरल शब्दों मे समझें तो हमारा अपनी इंद्रियों पर हमारा नियंत्रण होना ही प्रत्याहार है। यम, नियम, आसन व प्राणायाम के बाद ही प्रत्याहार सिद्ध होता है। जैसे जिव्हा रस के पीछे, नासिका सुगंध के पीछे भागती है, किंतु इन्हें अपने नियंत्रण में रखना ही प्रत्याहार है।
धारणा- एक ही ध्येय पर चित्त वृत्ति को स्थिर या केंद्रित करने को ही धारणा कहते हैं। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार से चित्त वृत्ति की चंचलता को संयमित करने में सहायता मिलती है। इनके अभ्यास के बिना धारणा सम्भव नहीं होती
ध्यान-धारणा के पश्चात ध्यान का क्रम प्रारंभ होता है। एकमात्र ध्येय की तरह ही एक ही तरह की वृत्ति का प्रवाह निरन्तर गतिशील होना, इसके मध्य किसी दूसरी वृत्ति का न उठना ही ध्यान कहलाता है। किसी एक दिव्य आनंद के चिंतन में अन्य चिंतन आने पर ध्यान टूट जाता है। यह भी समझना आवश्यक है कि ध्यान का अर्थ विचार शून्य हो जाना भी नहीं है। ध्यान का अभ्यास किसी योग्य साधक के मार्गदर्शन में करना ही उचित होता है।
समाधि- भारतीय जीवन दर्शन में मनुष्य जन्म का अंतिम लक्ष्य आत्म साक्षात्कार को माना गया है। इसे आत्मा का परमात्मा से मिलन भी कहा गया है। महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग के अंतिम चरण को समाधि के रूप में परिभाषित किया है। “तदेवार्थमात्रनिर्भासम स्वरूपपशून्यमिव समाधिः” अर्थात जब उसी ध्यान में अर्थ, लक्ष्य/ध्येय मात्र का ही अनुभव होता है और चित्त को स्वरूप का ज्ञान नहीं रहता तो वह समाधि हो जाता है। धारणा, ध्यान व समाधि एक दूसरे से जुड़े हैं क्योंकि धारणा ही ध्यान में बदलती है और ध्यान समाधि में परिवर्तित हो जाता है।
लेखिका:- प्रियंका कौशल
