जयपुर, 11 जनवरी । राजस्थान विधानसभा में बुधवार से शुरू हुए 83वें पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला चुनी हुई सरकारों के कामकाज में कोर्ट के गैर-जरूरी दखल के मुद्दे पर जमकर बरसे। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ से लेकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और सीएम अशोक गहलोत ने अदालती हस्तक्षेप के मुद्दे को उठाया। उपराष्ट्रपति ने संसद के बनाए कानून को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द करने पर खूब नाराजगी जाहिर की।
धनखड़ ने कहा कि क्या संसद के बनाए कानून पर कोर्ट की मुहर लगेगी, तभी कानून होगा? धनखड़ ने कहा कि 1973 में एक बहुत गलत परंपरा चालू हुई। केशवानंद भारती केस में सुप्रीम कोर्ट ने बेसिक स्ट्रक्चर का आइडिया दिया कि संसद संविधान संशोधन कर सकती है, लेकिन इसके बेसिक स्ट्रक्चर को नहीं। कोर्ट को सम्मान के साथ कहना चाहता हूं कि इससे मैं सहमत नहीं, हाउस बदलाव कर सकता है। यह सदन बताए कि क्या इसे किया जा सकता है? क्या संसद को यह अनुमति दी जा सकती है कि उसके फैसले को कोई और संस्था रिव्यू करे?
धनखड़ ने कहा कि जब मैंने राज्यसभा के सभापति का चार्ज लिया, तब कहा था कि न तो कार्यपालिका कानून को देख सकती है, न कोर्ट हस्तक्षेप कर सकती है। संसद के बनाए कानून को किसी आधार पर कोई संस्था अमान्य करती है, तो यह प्रजातंत्र के लिए ठीक नहीं होगा। उन्होंने कहा कि 2015 में ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी कानून सर्वसम्मति से पारित हुआ। 16 अक्टूबर, 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया। दुनिया में ऐसा कहीं नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के सामने संसद की संप्रभुता से समझौता कैसे हो सकता है?
उपराष्ट्रपति ने कहा कि आज संसद और विधानसभाओं का माहौल बहुत निराशाजनक है। हमारे चुने हुए जनप्रतिनिधियों का बर्ताव संसद और विधानसभा सदनों में बहुत गिरता जा रहा है। इस निराशाजनक माहौल का समाधान निकाला जाए, इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। संसद और विधानसभा में जनप्रतिनिधियों के अशोभनीय बर्ताव से जनता नाराज है। राज्यसभा का सभापति बनने के बाद देश भर के लोगों से मेरी चर्चा हुई है। लोगों ने कहा कि यह क्या कर रहे हो, क्या यह कल्पना थी हमारी? यह समझ से परे है, गले नहीं उतरता कि संविधान की शपथ लेने वाले जनप्रतिनिधि ऐसे आचरण करते हैं। लोग सोचते हैं कि हमारे चुनकर भेजे हुए जनप्रतिनिधि रास्ता दिखाएंगे, समस्याओं का हल निकालेंगे, लेकिन वे नियमों का पालन नहीं करते। सदन को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना गलत है। हमारी संविधान सभा के वक्त को देखिए, कितनी तरह की अलग अलग विचारधाराओं के लोग थे, लेकिन इस तरह आचरण नहीं हुआ।
सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि हमारे सदनों के अध्यक्ष चाहते हैं कि न्यायपालिका भी मर्यादा का पालन करे। न्यायपालिका से उम्मीद की जाती है कि वे संवैधानिक अधिकार का उपयोग करे, लेकिन अपनी शक्तियों का संतुलन भी बनाएं।
सम्मेलन में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि कई बार न्यायपालिका से मतभेद होते हैं। ज्यूडिशियरी हमारे कामों में हस्तक्षेप कर रही है। इंदिरा गांधी ने प्रिवी पर्स खत्म किए थे। इसे ज्यूडिशियरी ने रद्द कर दिया था। बाद में बैंकों के राष्ट्रीयकरण से लेकर उनके सब फैसलों के पक्ष में जजमेंट आए। चालीस साल से मैंने भी देखा है, कई बार हाउस नहीं चलता। 10-10 दिन गतिरोध चलता है। फिर भी पक्ष और विपक्ष मिलकर भूमिका निभाता है। पक्ष-विपक्ष अपनी-अपनी बात करते हैं। जब 75 साल निकल गए हैं तो देश का भविष्य बहुत उज्जवल है। हम संविधान की रक्षा करें। कई बार उस पर भी सवाल उठते हैं। देश में जो माहौल होता है, उसका लोकसभा-विधानसभा हाउस पर भी फर्क पड़ता है।
गहलोत ने कहा कि देश में लोकतंत्र की नींव ही ऐसी पड़ी कि विपक्ष को महत्व दिया जाता है। नेहरू जब पहले पीएम बने, तो उनकी कैबिनेट में विपक्ष के नेताओं को भी शामिल किया था। नेहरू ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बीआर अंबेडकर, एम सन्मुगम को अपनी कैबिनेट में लिया, जो कांग्रेस में नहीं थे। देश में शुरुआत ऐसी हुई कि विपक्ष को महत्व दिया गया। वो पार्टी के नहीं थे। फिर भी नेहरू ने उन्हें कैबिनेट में लिया। आज भी पक्ष और विपक्ष अपना-अपना महत्व रखता है। गहलोत ने कहा कि विधानसभा स्पीकर सीपी जोशी क्रांतिकारी नेता हैं। इनके दिमाग में जो होता है, वह बात जरूर कहते हैं। स्पीकर के सामने हाउस चलाना बहुत बड़ी चुनौती होती है। सरकार और विपक्ष के बीच संतुलन कायम रखना और अपनी क्रेडिबिलिटी कायम रखना बहुत बड़ी चुनौती होती है। वह चुनौती आप निभाते भी हो। हमारे उपराष्ट्रपति के तो हाउस चलाने के ताजा उदाहरण आ रहे हैं।
राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी ने कहा कि आज संसदीय लोकतंत्र के सामने कई चुनौतियां हैं। आज कार्यपालिका की तानाशाही है। विधानसभा सदनों की बैठकें ही कम हो रही हैं तो सरकार को जवाबदेह कौन बनाएगा। जब विधानसभा की बैठकें ही कम होंगी तो अकाउंटेबिलिटी उतनी नहीं रहेगी। संसद और विधानसभाओं में चर्चा नहीं होगी तो वे अप्रासंगिक हो जाएंगी। कानून बनाने की प्रक्रिया पर न बोलें तो ही बेहतर है। कानून बनाने में विधायकों की भूमिका कितनी है, सब जानते हैं। जोशी ने कहा कि विधानसभा स्पीकर तो हेल्पलेस हैं। विधानसभा के स्पीकर तो केवल रेफरी हैं। स्पीकर विधानसभा नहीं बुला सकते हैं। यह काम सरकार करती है। दुर्भाग्य यह है कि हम केवल हाउस चलाते हैं। बाकी कोई पाॅवर नहीं हैं। सीएम से कहना चाहता हूं कि विधानमंडल को वित्तीय फैसले लेने के अधिकार दिए जाएं। सीएम आज आदर्श पेश कर नई शुरुआत करें।
सम्मेलन का उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने शुभारंभ किया। यह सम्मेलन 11 से 12 जनवरी तक चलेगा, जिसमें राज्यों के विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष शामिल हुए हैं। सम्मेलन में देशभर से आए विधानसभा और विधान परिषदों के अध्यक्ष जी-20 से लेकर विधायिका और न्याय पालिका में टकराव रोकने के मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं। सम्मेलन के दौरान गुरुवार को अदालतों से टकराव रोकने को लेकर होने वाले सेशन पर सबकी निगाहें रहेंगी। इस सेशन में विधानसभा स्पीकर्स को विधायकों के दल बदल और इस्तीफों के मामले में हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट से मिलने वाले नोटिस का मुद्दा उठेगा।
