स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश और प्रारंभिक कार्य
आठवीं कक्षा में आने पर बिस्मिल जी आर्यसमाज के स्वामी सोमदेव के संपर्क में आए और यहीं से उनका झुकाव स्वतंत्रता संग्राम की ओर हो गया। 1916 में उन्होंने कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में भाग लिया, जहाँ उन्हें लोकमान्य तिलक, डॉ. केशव हेडगेवार, सोमदेव शर्मा और सिद्धगोपाल शुक्ल जैसे प्रमुख नेताओं से मिलने का अवसर मिला। वे तिलक जी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने लखनऊ में उनकी शोभा यात्रा भी निकाली।
बिस्मिल जी अपनी पुस्तकों को स्वयं लिखते और बेचते थे, जिससे प्राप्त धन को वे स्वतंत्रता संग्राम के कार्यों में लगाते थे। उनकी लेखन प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मात्र 19 वर्ष की आयु में उन्होंने “अमेरिका का स्वतंत्रता का इतिहास” नामक पुस्तक लिख दी थी, जो कानपुर से प्रकाशित हुई लेकिन बाद में जब्त कर ली गई। इस पुस्तक के प्रकाशन के लिए उनकी माता मूलमती देवी ने अपने आभूषण तक बेच दिए थे।
हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़ाव
1922 तक बिस्मिल कांग्रेस में सक्रिय रहे, लेकिन असहयोग आंदोलन में खिलाफत आंदोलन के जुड़ने और चौरी चौरा कांड के बाद उनके और उनकी युवा टोली के रास्ते अलग हो गए। वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी (बाद में एसोसिएशन) से जुड़ गए।
जनवरी 1923 में युवा क्रांतिकारियों ने एक तदर्थ पार्टी ‘रिवोल्यूशनरी पार्टी’ का गठन किया। सितंबर 1923 में, प्रसिद्ध क्रांतिकारी लाला हरदयाल की सलाह पर, राम प्रसाद बिस्मिल ने शचींद्रनाथ सान्याल और यदु गोपाल मुखर्जी के साथ मिलकर प्रयागराज में पार्टी का संविधान तैयार किया। इस नवगठित पार्टी का नाम संक्षेप में एच.आर.ए. (Hindustan Republican Association) रखा गया और इसका संविधान पीले रंग के पर्चे पर छापकर सदस्यों को भेजा गया।
3 अक्टूबर 1924 को कानपुर में एच.आर.ए. की पहली कार्यकारिणी बैठक हुई, जिसमें शचींद्रनाथ सान्याल, योगेश चंद्र चटर्जी और राम प्रसाद बिस्मिल प्रमुख रूप से उपस्थित थे। सर्वसम्मति से रामप्रसाद बिस्मिल को नेतृत्व सौंपा गया।
प्रचार अभियान और काकोरी कांड
नवगठित संस्था के संचालन के लिए धन की आवश्यकता थी। इसके लिए जनवरी 1925 में पार्टी की ओर से चार पृष्ठों का एक पम्फलेट (शीर्षक ‘क्रांतिकारी’) भारत के लगभग सभी प्रमुख नगरों में बांटा गया। इसे बिस्मिल जी ने स्वयं तैयार किया था, जिस पर ‘विजय कुमार’ का छद्म नाम लिखा था। पम्फलेट में क्रांतिकारियों के उद्देश्य, शासन व्यवस्था में सुधार की योजनाएँ, और लोगों से सहयोग की अपील की गई थी। इस प्रचार अभियान से कुछ धन भी एकत्रित हुआ।
पूरी तैयारी के बाद, सरकारी खजाना लूटने की योजना बनी। 7 अगस्त 1925 को शाहजहाँपुर में एक बैठक हुई, जहाँ 9 अगस्त 1925 को सरकारी खजाना लूटने का निर्णय लिया गया।
9 अगस्त 1925 को, रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में दस क्रांतिकारियों (अशफाक उल्ला खाँ, राजेन्द्र लाहिड़ी, चंद्रशेखर आजाद, शचींद्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्त, मुकुन्दी लाल, केशव चक्रवर्ती, मुरारी लाल गुप्त और बनवारी लाल) की टोली सहारनपुर से लखनऊ जाने वाली पैसेंजर रेलगाड़ी में सवार हुई। लखनऊ से पहले काकोरी रेलवे स्टेशन पर ट्रेन रुकने के बाद, जैसे ही वह आगे बढ़ी, क्रांतिकारियों ने चेन खींचकर उसे रोक लिया और गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया। बक्सा तोड़ने की कोशिश में, अशफाक उल्ला खाँ ने मन्मथनाथ गुप्त को अपना माउजर पकड़ा दिया और स्वयं हथौड़ा लेकर बक्सा तोड़ने लगे। इसी दौरान उत्सुकतावश मन्मथनाथ गुप्त से माउजर का ट्रिगर दब गया, जिससे निकली गोली अहमद अली नामक एक यात्री को लग गई और उसकी मौके पर ही मौत हो गई।
जल्दबाजी में चाँदी के सिक्कों और नोटों से भरे चमड़े के थैले चादरों में बांधकर भागते समय एक चादर वहीं छूट गई।
काकोरी कांड के बाद गिरफ्तारी और बलिदान
ब्रिटिश सरकार ने इस ट्रेन डकैती को गंभीरता से लिया और स्कॉटलैंड की सबसे तेज तर्रार पुलिस को जाँच के लिए बुलाया। पुलिस को घटनास्थल पर मिली चादर में लगे निशान से पता चला कि वह चादर शाहजहाँपुर के किसी व्यक्ति की है। पूछताछ में यह चादर बनारसी लाल की निकली, जिसके घर पर ही बैठक हुई थी। बनारसी लाल ने पुलिस पूछताछ में सारा भेद खोल दिया और सभी साथियों के नाम बता दिए।
26 सितंबर 1925 की रात को देश में एक साथ चालीस स्थानों पर छापे पड़े और राम प्रसाद बिस्मिल सहित कुल चालीस लोग बंदी बनाए गए।
जेल में रहते हुए राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा लिखी, जिसका अंतिम अध्याय 16 दिसंबर 1927 को पूरा हुआ। 18 दिसंबर को उनके माता-पिता और बहन ने उनसे अंतिम भेंट की, जहाँ उन्होंने अपनी डायरी अपनी बहन को सौंपी।
सोमवार, 19 दिसंबर 1927 को सुबह 6 बजकर 30 मिनट पर गोरखपुर की जिला जेल में उन्हें फाँसी दे दी गई। बिस्मिल के बलिदान का समाचार सुनकर बड़ी संख्या में जनता जेल के फाटक पर एकत्र हो गई। जेल का मुख्य द्वार बंद रखा गया, और फाँसीघर के सामने वाली दीवार को तोड़कर बिस्मिल का शव उनके परिजनों को सौंपा गया। डेढ़ लाख लोगों ने जुलूस निकालकर पूरे शहर में घुमाते हुए राप्ती नदी के किनारे राजघाट पर उनका अंतिम संस्कार किया। इस प्रकार, मातृभूमि के इस सपूत ने “वंदे मातरम्” के घोष के साथ स्वयं को देश के लिए समर्पित कर दिया।
