विद्वानों को आखिर क्यों कहना पड़ा कि—”वैद्यराज नमस्तुभ्यं यमराजसहोदरः”? यह सवाल हर संवेदनशील व्यक्ति के मन में उठता है। मुझे दो चीजें हमेशा परेशान करती हैं—एक डॉक्टरों की पर्ची और दूसरी बड़ी अदालतों के फैसलों की भाषा। मैं विज्ञान का स्नातक और स्नातकोत्तर अंग्रेजी माध्यम से हूं, फिर भी जब डॉक्टर की पर्ची देखता हूं तो अक्सर समझ नहीं पाता। सोचिए उन लोगों का क्या हाल होता होगा जो पढ़ाई के समय एबीसीडी सुनते ही घबरा जाते थे।
डॉक्टरों की पर्ची किसी रहस्यमयी कूटलिपि में लिखी होती है, जिसे केवल वही मेडिकल स्टोरवाला पढ़ सकता है जिसके पास भेजने की सिफारिश की जाती है। मैंने एक बार मेडिकल स्टोर बदल दिया तो दुकानदार ने ईमानदारी से बता दिया कि दवा वहीं मिलेगी जहाँ से डॉक्टर ने लिखी है। वह चाहता तो कुछ भी पकड़ा सकता था क्योंकि पर्ची मेरी समझ से बाहर थी, और मैं उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता था। क्योंकि मैं एक आम मरीज हूं—मेडिकली निरक्षर।
कई बार मरीज को यह पता भी नहीं चलता कि उसका इलाज हो रहा है या उस पर कोई दवा का ट्रायल चल रहा है। इंदौर में हुए ड्रग ट्रायल कांड के बाद यह सच सामने आया कि किस तरह दवा कंपनियां और कुछ डॉक्टर मिलकर मरीजों को अनजाने में टेस्टिंग का माध्यम बना देते हैं। आम आदमी को इसकी भनक तक नहीं लगती। डॉक्टर जल्दी में मरीज को दवा के इस्तेमाल की जानकारी दे देते हैं—इसे खाना है, इसे लगाना है, इसे दो बार, इसे तीन बार, जब तक दर्द असहनीय हो तब तक लेते रहना है।
इतनी सारी जांचें और दवाएं देखकर मरीज का अटेंडेंट पर्ची और बटुए दोनों पर नजर डालने लगता है। बहुत सारे मरीज केवल फीस देकर पर्ची हाथ में लिए बिना दवा खरीदे या जांच कराए लौट जाते हैं। कुछ कर्ज लेकर लौटते हैं, और बाकी खुद को भगवान के भरोसे छोड़ देते हैं—सोचते हैं कि दवा खाएं या न खाएं, एक दिन तो मरना ही है।
गांव-मोहल्लों में ऐसे कई मामले मिलते हैं जहां गलत दवा या इंजेक्शन से लोग मर जाते हैं या विकलांग हो जाते हैं। कई बार मर्ज कुछ और होता है, इलाज कुछ और का दिया जाता है। न तो इसका कोई हिसाब-किताब होता है, न ही कोई केस दर्ज होता है। ये चिकित्सा व्यवस्था की अराजकता का जीता-जागता प्रमाण है।
अब तो डॉक्टर पर्ची में यह भी लिखने लगे हैं कि—यह पर्ची किसी कानूनी कार्रवाई के लिए मान्य नहीं है। और यह वाक्य साफ-सुथरी हिंदी में होता है ताकि मरीज समझ जाए कि दवा से कुछ बिगड़ा तो डॉक्टर जिम्मेदार नहीं। लेकिन मर्ज और दवा का नाम साफ-साफ लिखना, उपयोग की स्पष्ट जानकारी देना, यह उनकी जिम्मेदारी नहीं मानी जाती।
अंग्रेजी का असर और उसकी चमक-दमक केवल तब तक रहती है जब तक सामने वाला उसे समझ नहीं पाता। जिस दिन आम लोग इसे समझने लगेंगे, उस दिन इसका तिलिस्म भी टूट जाएगा। बड़े डॉक्टरों और वकीलों की दुकानदारी भी इसी पर टिकी है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने निर्देश तो दिए हैं कि डॉक्टर साफ अक्षरों में दवा लिखें, हिंदी में भी उल्लेख करें, लेकिन वह लिखा कहाँ जाता है—इसे देखने के लिए मैग्नीफाइंग ग्लास की जरूरत पड़ती है।
दवाओं की जानकारी, कंपोजीशन, साइड इफेक्ट्स जैसी जरूरी बातें इतनी बारीक अक्षरों में लिखी होती हैं कि पढ़ना मुश्किल होता है। इससे आंखें खराब हो सकती हैं। एक ही दवा को अलग-अलग ब्रांड के नाम से बेचा जाता है, और दामों में भारी अंतर होता है—कई जगह तो 70% तक का फर्क मिलता है। न कोई नियंत्रण, न निगरानी। सेवा क्षेत्र के सबसे संवेदनशील हिस्से में इतनी बेरहमी क्यों?
जब देश में कोई बड़ा नेता, अफसर या जनप्रतिनिधि सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं कराता, तो आम आदमी का उस सिस्टम पर भरोसा कैसे होगा? निजी अस्पतालों में इलाज नीलामी की तरह होता है—जितना पैसा, उतना इलाज। देश की औसत साक्षरता दर 75% है, लेकिन उनमें भी केवल 10% लोग वास्तव में शिक्षित माने जा सकते हैं। बाकी लोग सिर्फ उतना पढ़ सकते हैं जितना विज्ञापन में छपा हो। डॉक्टरों की मेडिकल पर्ची को तो ये लोग किसी रहस्य ग्रंथ की तरह ही देखते हैं।
जब डॉक्टरों की भाषा ये 10% पढ़े-लिखे लोग भी नहीं समझ पाते तो बाकी लोगों की स्थिति क्या होगी—वे तो जैसे डॉक्टरों की दुनिया में केवल ‘प्रयोग’ के लिए मौजूद हैं। इसीलिए कभी विद्वानों को कहना पड़ा—“वैद्यराज नमस्तुभ्यं यमराजसहोदरः। यमस्तु हरति प्राणान्, वैद्यो प्राणान् धनानि च।” यानी यमराज तो केवल प्राण लेते हैं, लेकिन वैद्यराज प्राण और धन दोनों लेते हैं।
हर डॉक्टर की पर्ची में ‘Rx’ लिखा होता है—यह हिप्पोक्रेटिक शपथ की याद दिलाता है, जो चिकित्सा के महान आदर्श माने जाते हैं। डॉक्टर इस शपथ का सिर्फ दसवां हिस्सा भी ईमानदारी से निभा लें तो दुनिया को और किसी कानून की जरूरत नहीं पड़ेगी।
हमारी सनातनी परंपरा में धनवंतरि को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है, इसलिए डॉक्टरों को देवता के समान माना जाता है। लेकिन जब वे इस भरोसे को तोड़ते हैं, तब वे यमराज के समकक्ष प्रतीत होते हैं। यही कारण है कि मनीषियों को कहना पड़ा—”यम प्राण हरते हैं, वैद्यराज प्राण और धन दोनों हरते हैं।”
