पटना, 11 नवंबर । बिहार में जब भी सत्ता की हलचल होती है, इतिहास खुद-ब-खुद जीवंत हो उठता है। चुनावी अखाड़े में नारे बदल जाते हैं, चेहरे बदल जाते हैं,लेकिन बिहार की धरती में दर्ज संघर्ष, त्याग और गौरव की कहानी लोगों को हर बार याद दिलाती है कि यह वही धरती है, जहां से साम्राज्यों का निर्माण हुआ, क्रांतियां उठीं और देश की दिशा तय हुई।
वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र बताते हैं कि कभी इसी धरती के राजगृह और पाटलिपुत्र से शासन चलता था, जहां से सम्राट अशोक ने अहिंसा का संदेश दिया। राजनीति के शिखर से लेकर बौद्ध दर्शन के केंद्र तक बिहार ने भारत को न केवल ताकत दी, बल्कि सोच भी दी। आज जब राजनीति में फिर सुशासन और नए बिहार की बातें हो रही हैं, तो जनता पूछती है कि क्या हम अपने उस गौरव की ओर लौट पाए हैं?
गुप्तकाल से ज्ञानकाल तक शिक्षा का पर्याय रहा बिहार
आर्यभट्ट, चाणक्य और वात्स्यायन जैसी प्रतिभाएं इसी मिट्टी से निकलीं। जब यूरोप अंधकार युग में था, तब बिहार के नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों में ज्ञान की दीपशिखा जल रही थी। आज वही बिहार शिक्षा के संकट से जूझ रहा है। बेरोजगारी और पलायन के बीच यह सवाल सियासी मंचों पर गूंज रहा है कि जिस राज्य ने दुनिया को ज्ञान दिया, वह खुद आज डिग्री के लिए भटक क्यों रहा है?
चम्पारण की धरती से उठा आजादी का बिगुल
वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र बताते हैं कि बिहार के इतिहास की सबसे बड़ी ताकत उसका जन-आंदोलन रहा है। 1917 का चम्पारण सत्याग्रह केवल किसानों का आंदोलन नहीं था, बल्कि एक नई राजनीति की शुरुआत थी। डॉ. राजेंद्र प्रसाद और जयप्रकाश नारायण ने इसी धरती से देश को नैतिक राजनीति का पाठ पढ़ाया। आज जब भ्रष्टाचार, जाति और सत्ता की राजनीति पर बहस हो रही है, तब बिहार की जनता फिर वही पुराना सवाल पूछ रही है कि क्या राजनीति फिर वैचारिक हो पाएगी?
स्वतंत्रता के बाद का बिहार: गौरव और गिरावट का मिश्रण
राजनीति के जानकार चंद्रमा तिवारी कहते हैं कि आजादी के बाद बिहार ने देश को पहला राष्ट्रपति दिया, लेकिन कुछ दशकों में वही राज्य पलायन, बाढ़ और पिछड़ेपन का प्रतीक बन गया। 1970 के दशक में जेपी आंदोलन से निकली आवाज ने इंदिरा गांधी की सत्ता हिला दी, पर उसी आंदोलन की संताने अब अलग-अलग खेमों में बंटी दिखाई देती हैं। हर चुनाव से पहले जनता सुनती है कि बदल जाएगा बिहार, लेकिन सवाल यह है कि कबतक इतिहास के नाम पर ही वोट मिलते रहेंगे?
झारखंड विभाजन और नई राजनीति का दौर
प्रो. राकेश तिवारी याद दिलाते हैं कि साल 2000 में जब झारखंड अलग हुआ, तब बिहार के पास न उद्योग बचा, न पहाड़, न खनिज। राज्य को नई पहचान देनी थी। 2005 के बाद शासन और विकास की बातें हुईं, सड़कों और शिक्षा के नए मॉडल बने, लेकिन 2025 के चुनाव के पहले एक बार फिर वही मुद्दे लौट आए हैं, बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और जाति समीकरण।
जनता का सवाल: क्या बिहार फिर अपने इतिहास जैसा बनेगा?
बिहार की जनता जानती है कि उसका अतीत कितना महान रहा है, लेकिन वह यह भी देख रही है कि आधुनिक राजनीति में वही गौरव अब सिर्फ भाषणों में रह गया है। नालंदा की साख, चंपारण की स्मृति और जेपी की क्रांति के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं, लेकिन राज्य की जनता कह रही है, “हमें इतिहास नहीं, भविष्य चाहिए, लेकिन ऐसा भविष्य जो इतिहास की गरिमा से मेल खाता हो।”
राजनीति की धरती पर इतिहास की गूंज
हर दल बिहार को महापुरुषों की भूमि कहता है, लेकिन विकास की चर्चा वहीं ठहर जाती है, जहां से चुनावी घोषणाएं शुरू होती हैं। इतिहास गवाही देता है कि इस मिट्टी ने जब भी चाहा, दिशा बदली है। मगध के सम्राट से लेकर जेपी तक और अब लोकतंत्र के नए युग में बिहार हमेशा परिवर्तन का केंद्र रहा है। अब देखना यह है कि 2025 का यह चुनाव उस गौरवशाली इतिहास की नई कड़ी बनेगा या सिर्फ उसकी गूंज में एक और राजनीतिक शोर।
वादों से आगे जनता अब नतीजों की राजनीति चाहती है
राजनीतिक विश्लेषक राजेन्द्र तिवारी ने कहा कि मतदाताओं में जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सुशासन मॉडल और योजनाओं की चर्चा है, उससे यही जाहिर होता है कि बिहार की जनता अब केवल घोषणाओं पर भरोसा नहीं कर रही। वह वादों से हटकर परिणाम और धरातलीय बदलाव चाहती है। चम्पारण के किसान आंदोलन से लेकर आज के चुनावी माहौल तक, बिहार की जनता ने हमेशा संघर्ष और मेहनत का महत्व समझा है। इस बार भी संदेश स्पष्ट है कि इतिहास और नारे अब पर्याप्त नहीं, जनता परिणाम और ठोस विकास देखती है।
