वैज्ञानिकों ने इंग्लैंड के नॉर्थम्बरलैंड में हॉविक बे के पास एक चौंकाने वाली खोज की है। समुद्र किनारे चट्टान खिसकने के बाद, एक बड़ी चट्टान के भीतर छिपा हुआ एक दुर्लभ जीवाश्म मिला। जांच में सामने आया कि यह किसी विशाल कनखजूरे का अवशेष है, जो करीब 326 मिलियन साल पहले पृथ्वी पर मौजूद था—डायनासोरों के आने से बहुत पहले। इस प्राचीन जीव का नाम आर्थ्रोप्लुरा है, जिसे वैज्ञानिक अब तक का सबसे बड़ा ज़मीनी कीड़ा मानते हैं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, आर्थ्रोप्लुरा की लंबाई करीब 2.7 मीटर (9 फीट) तक हो सकती थी और इसका वजन लगभग 50 किलोग्राम तक रहा होगा। मिला हुआ जीवाश्म इसके शरीर का करीब 75 सेंटीमीटर लंबा हिस्सा है, जिसे इसका उतरा हुआ बाहरी खोल यानी मोल्ट माना जा रहा है। इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने इसके पूरे शरीर का आकार अनुमानित किया है, जो लगभग एक छोटी कार जितना बड़ा हो सकता था।
यह विशाल जीव कार्बोनिफेरस काल में रहता था, जब आज का ब्रिटेन भूमध्य रेखा के पास स्थित था। उस समय का वातावरण गर्म, नम और घने जंगलों से भरा हुआ था। माना जाता है कि आर्थ्रोप्लुरा खुले जंगलों और नदियों के आसपास रहता था। पहले वैज्ञानिकों का मानना था कि ऐसे विशाल कीड़े केवल दलदली इलाकों तक सीमित थे, लेकिन यह खोज बताती है कि वे सूखे और खुले जंगलों में भी घूमते थे।
इस खोज का नेतृत्व कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डॉ. नील डेविस ने किया। उन्होंने बताया कि यह खोज पूरी तरह संयोग से हुई, जब उनके एक पूर्व छात्र ने समुद्र तट पर टहलते हुए इस पत्थर को देखा। बाद में 2018 में इसे सावधानी से खोदा गया। इस काम में नेचुरल इंग्लैंड और स्थानीय लोगों ने भी सहयोग किया। इस शोध को जियोलॉजिकल सोसायटी के जर्नल में प्रकाशित किया गया है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अब तक मिला सबसे बड़ा ज़मीनी आर्थ्रोपॉड है। लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि प्राचीन काल में हवा में ऑक्सीजन की मात्रा ज़्यादा होने के कारण कीड़े इतने बड़े हो गए थे। लेकिन यह जीवाश्म उस दौर का है जब ऑक्सीजन का स्तर करीब 23% था, जो आज के 21% से थोड़ा ही अधिक है। इससे यह धारणा बदल रही है कि सिर्फ ऑक्सीजन ही उनके विशाल आकार की वजह थी।
अब वैज्ञानिक मानते हैं कि इसके बड़े आकार के पीछे कई कारण रहे होंगे—घने पौधे, ज़मीन पर कम शिकारी, और स्थिर व नम मौसम। इन परिस्थितियों ने ऐसे विशाल जीवों को लंबे समय तक फलने-फूलने का मौका दिया।
2024 में फ्रांस में मिले आर्थ्रोप्लुरा के छोटे जीवाश्मों के CT स्कैन से पहली बार इसके सिर की बनावट का पता चला। इसके सिर में छोटे एंटीना, डंठल जैसी आंखें और अंदरूनी जबड़े पाए गए, जिससे साफ होता है कि यह आज के मिलिपीड्स से अलग, लेकिन उनसे जुड़ा हुआ एक प्राचीन समूह था।
करीब 45 मिलियन साल तक पृथ्वी पर रहने के बाद, आर्थ्रोप्लुरा लगभग 290 मिलियन साल पहले विलुप्त हो गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि सूखे हालात, जंगलों का खत्म होना और नमी में कमी इसके विलुप्त होने के मुख्य कारण रहे होंगे। कुछ शोधकर्ता शुरुआती सरीसृपों के उभरने को भी संभावित वजह मानते हैं, हालांकि इसके ठोस सबूत अभी नहीं मिले हैं।
अब तक आर्थ्रोप्लुरा का पूरा कंकाल नहीं मिला है। ज़्यादातर जीवाश्म इसके उतरे हुए बाहरी खोल के हैं। फिर भी, कनाडा और अन्य जगहों पर मिले इसके पैरों के निशान बताते हैं कि यह जंगल की ज़मीन पर धीरे-धीरे चलता था। फिलहाल यह जीवाश्म कैम्ब्रिज के सेडगविक म्यूज़ियम में सुरक्षित रखा गया है। यह खोज दिखाती है कि डायनासोरों से पहले की दुनिया कितनी अनोखी और रहस्यमयी थी, जहां कवच जैसे शरीर वाले विशाल कीड़े भी धरती पर राज करते थे।
