लिफ्ट एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक साधन है जिसका उपयोग किसी भी वस्तु को ऊँचाई पर लाने ले जाने का काम करती है इसका उपयोग बिल्डिंग, एयरपोर्ट मॉल और बड़े होटलों में अक्सर हमको देखने को मिलता है. लिफ्ट को एक elevator भी कहा जाता है जिसका इस्तेमाल लोगों को या चीज़ों को ऊपर या निचे लेने या लाने के लिए होता है. इन लिफ्ट को चलाने के लिए electrical motors (विद्युतचलित मोटर) का उपयोग किया जाता है. लिफ्ट का आविष्कार किसने किया था? मॉडर्न सेफ्टी लिफ्ट का आविष्कार “Elisha Graves otis” ने किया था. जिसे की पहली बार कमर्शियल कार्यों के लिए भी इस्तेमाल किया गया क्योंकि ये बहुत ही सेफ थे जिसमें गिरने का बिलकुल भी डर नहीं था. लिफ्ट का आविष्कार कब हुआ? लिफ्ट का आविष्कार 1852 ईस्वी में अमेरिका के वैज्ञानिक एलिसा ग्रेव ओटिस ने किया था. तब से लेकर आज तक लिफ्ट के इस आविष्कार में कई बदलाव देखने को मिलेंगे. आज के लिफ्ट विद्युत द्वारा चलते हैं. लिफ्ट का आविष्कार क्यों हुआ? जैसा कि हम जानते हैं कि लिफ्ट का का कार्य आज कंस्ट्रक्शन की बिल्डिंगों बड़े होटलों मॉल और एयरपोर्ट ज्यादा तर बड़ी बिल्डिंगों में समान या व्यक्ति खुद को लाने ले जाने के लिए करता है. जब लिफ्ट नही था तब किसी भी उचाई पर कोई वस्तु ले जाने के लिए बहुत समस्या हुआ करती थी तब ऊँचाई पर कुछ ले जाने के लिए रस्सियों का प्रयोग किया जाता था जोकि काफी जोखिम भरा होता था इस समस्या का समाधान करने के लिए वैज्ञानिकों ने लिफ्ट का आविष्कार किया. एलीवेटर का आविष्कार किसने किया? लिफ्ट को देख कर यही लगता है कि यह modern ज़माने की खोज है लेकिन बिल्कुल नही है लिफ्ट आज से नही बल्कि इसका बहुत लंम्बा इतिहास है इतिहास की माने तो 236 bc में महान रोमन आर्किटेक्ट Vitruvius ने लिफ्ट बनाई बाद में उन्होंने अरकमडीज को बताया . अगर ऐसा कहे तो बुरा नही होगा कि लिफ्ट की खोज में कई वैज्ञानिको का सतत प्रयास रहा है ! इसलिए किसी एक को पूरा श्रेय देना संभव नहीं है. पहली Electric लिफ्ट का आविष्कार किसने किया?...
Lok Swaraj24
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दशम सिख गुरु गोविंदसिंहजी आनन्दपुर साहिब में विराजमान थे | उन्हें तृषा का अनुभव हुआ, तो बोले, “कोई मुझे पवित्र हाथों से जल पिलाये |’’ एक संभ्रान्त व्यक्ति उठा और जल ले आया | जलपात्र लेते समय गुरूजी का स्पर्श उस व्यक्ति के हाथ से हो गया | वे पूछ बैठे, “तुम्हारे हाथ इतने कोमल क्यों है ?’’ वह अपनी प्रशंसा समझ फूला न समाया | बोला, “गुरूजी, मेरे अनेक सेवक हैं | मैं स्वयं कोई कार्य नहीं किया करता, इसलिए मेरे हाथ इतने कोमल हैं |’’ गुरूजी ने अंधेरों तक लाये हुए जलपात्र को नीचे रख दिया और वे गम्भीर स्वर में बोले, “जिन हाथों ने कभी सेवा ही न की, वे पवित्र कैसे, हुए ? पवित्रता तो सेवा से ही प्राप्त होती है | मैं तुम्हारे हाथ का जल ग्रहण नहीं कर सकता |’’ वह व्यक्ति शर्मिन्दा हो गया और उसने गुरूजी को वचन दिया कि वह न केवल अपने कार्य स्वयं किया करेगा, वरन अब दूसरों की सेवा भी किया करेगा |
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