इंदौर (मप्र), 31 मार्च । शहर के श्री बेलेश्वर महादेव झूलेलाल मंदिर के बावड़ी हादसे में अब...
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भोपाल, 31 मार्च । मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के बीएचईएल दशहरा मैदान पर आज (शुक्रवार )...
श्रीनगर, 30 मार्च । चैत्र नवरात्र की समाप्ति तथा रामनवमी के पर्व को कश्मीर घाटी में कश्मीरी...
हरिद्वार, 30 मार्च । केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने गुरुवार को उम्मीद जताई कि अयोध्या में निर्माणाधीन...
हरिद्वार, 30 मार्च । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा.मोहन भागवत ने कहा कि सबसे बड़ा त्याग...
देहरादून, 30 मार्च । केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया अपने दो दिवसीय दौरे के पहले दिन गुरुवार...
मुंबई, 30 मार्च महाराष्ट्र के संभाजीनगर जिले में स्थित किराड नगर परिसर मेंं स्थित राम मंदिर के...
नई दिल्ली, 30 मार्च। केन्द्र सरकार ने दुर्लभ बीमारियों के इलाज में व्यक्तिगत उपयोग के लिए आयातित...
पूरी दुनिया में सबसे तेजी से उभरते पर्यटन गंतव्यों में से एक, भारत का यात्रा और पर्यटन...
भारतीय भूमि हमेशा से ही एक पवित्र भूमि रही है, इतिहास के अनुसार यहाँ कई देवी देवताओं ने अवतार लिए है. रामनवमी एक ऐसा पर्व है, जिस पर चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को प्रतिवर्ष नये विक्रम संवत्सर का प्रारंभ होता है और उसके आठ दिन बाद ही चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी को एक पर्व राम जन्मोत्सव का, जिसे ‘रामनवमी’ के नाम से जाना जाता है, समस्त देश में मनाया जाता है। इस देश की राम और कृष्ण दो ऐसी महिमाशाली विभूतियाँ रही हैं, जिनका अमिट प्रभाव समूचे भारत के जनमानस पर सदियों से अनवरत चला आ रहा है। रामनवमी, भगवान राम की स्मृति को समर्पित है। राम सदाचार के प्रतीक हैं, और इन्हें “मर्यादा पुरुषोतम” कहा जाता है। रामनवमी को राम के जन्मदिन की स्मृति में मनाया जाता है। राम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है, जो पृथ्वी पर अजेय रावण (मनुष्य रूप में असुर राजा) से युद्ध लड़ने के लिए आए। राम राज्य (राम का शासन) शांति व समृद्धि की अवधि का पर्यायवाची बन गया है। रामनवमी के दिन, श्रद्धालु बड़ी संख्या में उनके जन्मोत्सव को मनाने के लिए राम जी की मूर्तियों को पालने में झुलाते हैं। इस महान् राजा की काव्य तुलसी रामायण में राम की कहानी का वर्णन है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान विष्णु ने राम रूप में असुरों का संहार करने के लिए पृथ्वी पर अवतार लिया और जीवन में मर्यादा का पालन करते हुए मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। आज भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्मोत्सव तो धूमधाम से मनाया जाता है पर उनके आदर्शों को जीवन में नहीं उतारा जाता। अयोध्या के राजकुमार होते हुए भी भगवान राम अपने पिता के वचनों को पूरा करने के लिए संपूर्ण वैभव को त्याग 14 वर्ष के लिए वन चले गए और आज देखें तो वैभव की लालसा में ही पुत्र अपने माता-पिता का काल बन रहा है। राम का जन्म पुरुषोतम भगवान राम का जन्म चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में कौशल्या की कोख से हुआ था। यह दिन भारतीय जीवन में पुण्य पर्व माना जाता हैं। इस दिन सरयू नदी में स्नान करके लोग पुण्य लाभ कमाते हैं। अगस्त्यसंहिता के अनुसार मंगल भवन अमंगल हारी, दॄवहुसु दशरथ अजिर बिहारि॥ अगस्त्यसंहिता के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी, के दिन पुनर्वसु नक्षत्र, कर्कलग्न में जब सूर्य अन्यान्य पाँच ग्रहों की शुभ दृष्टि के साथ मेष राशि पर विराजमान थे, तभी साक्षात् भगवान् श्रीराम का माता कौशल्या के गर्भ से जन्म हुआ। धार्मिक दृष्टि से चैत्र शुक्ल नवमी का विशेष महत्व है। त्रेता युग में चैत्र शुक्ल नवमी के दिन रघुकुल शिरोमणि महाराज दशरथ एवं महारानी कौशल्या के यहाँ अखिल ब्रह्माण्ड नायक अखिलेश ने पुत्र के रूप में जन्म लिया था। राम का जन्म दिन के बारह बजे हुआ था, जैसे ही सौंदर्य निकेतन, शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए हुए चतुर्भुजधारी श्रीराम प्रकट हुए तो माता कौशल्या उन्हें देखकर विस्मित हो गईं। राम के सौंदर्य व तेज को देखकर उनके नेत्र तृप्त नहीं हो रहे थे। देवलोक भी अवध के सामने श्रीराम के जन्मोत्सव को देखकर फीका लग रहा था। जन्मोत्सव में देवता, ऋषि, किन्नर, चारण सभी शामिल होकर आनंद उठा रहे थे। हम प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल नवमी को राम जन्मोत्सव मनाते हैं और राममय होकर कीर्तन, भजन, कथा आदि में रम जाते हैं। रामनवमी के दिन ही गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना का श्रीगणेश किया था। राम नवमी क्यों मनाते है त्रेता युग में लोग...
