उधम सिंह भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के महान सेनानी एवं क्रान्तिकारी थे I सरदार उधम सिंह का...
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हर वर्ष सावन माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि के अगले दिन कामिका एकादशी मनाई जाती...
मोहम्मद रफ़ी एक महान पार्श्व गायक थे, जिन्होंने लगभग 40 वर्षों के करियर में 25,000 से अधिक गाने रिकॉर्ड कियेI मुहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसम्बर, 1924 को अमृतसर ज़िला, पंजाब में हुआ था। रफ़ी ने कम उम्र से ही संगीत में रुचि दिखानी शुरू कर दी थी। बचपन में ही उनका परिवार ग्राम से लाहौर आ गया था। रफ़ी के बड़े भाई उनके लिए प्रेरणा के प्रमुख स्रोत थे। रफ़ी के बड़े भाई की अमृतसर में नाई की दुकान थी और रफ़ी बचपन में इसी दुकान पर आकर बैठते थे। उनकी दुकान पर एक फ़कीर रोज आकर सूफ़ी गाने सुनाता था। सात साल के रफ़ी साहब को उस फ़कीर की आवाज़ इतनी भाने लगी कि वे दिन भर उस फ़कीर का पीछा कर उसके गाए गीत सुना करते थे। जब फ़कीर अपना गाना बंद कर खाना खाने या आराम करने चला जाता तो रफ़ी उसकी नकल कर गाने की कोशिश किया करते थे। वे उस फ़कीर के गाए गीत उसी की आवाज़ में गाने में इतने मशगूल हो जाते थे कि उनको पता ही नहीं चलता था कि उनके आसपास लोगों की भीड़ खड़ी हो गई है। कोई जब उनकी दुकान में बाल कटाने आता तो सात साल के मुहम्मद रफ़ी से एक गाने की फरमाईश जरुर करता। एक बार संगीतकार पंडित जीवनलाल नाई की दुकान पर पहुंचे. जब उन्होंने गुनगुनाते हुए रफी को बाल काटते हुए सुना तो बेहद खुश हुए. रफी को रेडियो चैनल के ऑडीशन में बुलाया गया, जिसे उन्होंने आसानी से पार कर लिया. जीवनलाल ने ही रफी को गायिकी की ट्रेनिंग दी और वो रेडियो में गानों को आवाज देने लगे. 1937 की बात है जब स्टेज में बिजली ना होने पर पॉपुलर सिंगर कुंदनलाल सहगल ने स्टेज पर गाने से इनकार कर दिया.आयोजकों ने यहां 13 साल के रफी को मौका दिया. दर्शकों के बैठे केएल सहगल ने हुनर भांपते हुए कहा कि देखना ये लड़का एक दिन बड़ा सिंगर बनेगा. के एल सहगल की बात सालों बाद सच साबित हुई. मोहम्मद रफ़ी का पहला गाना : उनका पहला गाना 1944 एक पंजाबी फिल्म “गुलबालोच” की थी उस गाने के बोल थे – “सोणी हीरीए तेरी याद ने बहुत सताया”। ज़ीनत बेगम के साथ संगीतकार श्याम सुंदर के संगीत निर्देशन में यह उनका पहला गाना था। उसके बाद श्याम सुंदर बंबई में थे और उन्होंने रफी को जीएम दुर्रानी के साथ एक युगल गीत गाने का मौका दिया , “अजी दिल हो काबू में तो दिलदार की ऐसी तैसी…,” गांव की गोरी के लिए 1945, जो रफी का हिंदी फिल्म में पहला रिकॉर्ड किया गया गीत बन गया। इसके बाद अन्य गाने भी आए उन्होंने आसामी, कोकणी, पंजाबी, उड़िया, मराठी, बंगाली के साथ साथ स्पेनिश और अंग्रेजी में भी गाने गाए थे अपने शुरुआती करियर में रफ़ी कई समकालीन संगीत निर्देशकों के साथ जुड़े, जिनमें सबसे उल्लेखनीय नौशाद अली थे । 1950 और 1960 के दशक के अंत में, उन्होंने ओपी नैयर , शंकर जयकिशन , एसडी बर्मन और रोशन जैसे उस दौर के अन्य संगीतकारों के साथ काम किया । नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफ़ी का आखिरी गाना अली सरदार जाफरी द्वारा लिखित फिल्म “हब्बा खातून” के लिए था। गाने के बोल थे -‘जिस रात के ख्वाब आए वह रात आई’ । पुरुस्कार एवं सम्मान : मोहम्मद रफ़ी जी को एक राष्ट्रिय और 6 फिल्मफेयर पुरुस्कार मिला I राष्ट्रीय फिल्म पुरुस्कार : क्या हुआ तेरा वादा ( हम किसी से कम नही )1977 फिल्मफेयर पुरुस्कार : “चौदहवीं का चाँद हो” (चौदहवीं का चाँद) 1960, “तेरी प्यारी प्यारी सूरत को”(ससुराल)1961, “चाहूंगा मैं तुझे” (दोस्ती)1964, “बहारो फूल बरसाओ”(सूरज)1966, “दिल के झरोके में”(ब्रम्हचारी)1968, “क्या हुआ तेरा वादा”( हम किसी से कम नही)1977 वर्ष 1948 में भारतीय स्वतंत्रता दिवस की पहली वर्षगांठ पर मोहम्मद रफी को भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा एक रजत पदक मिला था। वर्ष 1967 में मोहम्मद रफी को भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। 4 साल तक लता के साथ नहीं किया काम :- लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी ने साथ में सैकड़ो गाने गए थे, लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया था जब उन्होंने रफ़ी साहब के से बातचीत बंद कर दी थी. दरअसल लता गानों पर रॉयल्टी चाहती थी , जबकि मोहम्मद रफ़ी ने कभी भी रॉयल्टी की मांग नहीं की . दोनों का विवाद इतना बढ़ा की मोहम्मद रफ़ी और लता के बीच बातचीत बंद हो गयी थी . इस कारण दोनों ने एक साथ गाना गाने से भी इंकार कर दिया था. कहा जाता है की लता ने इंडस्ट्री में सभी सिंगर्स की आवाज़ उठाते हुए उनके लिए रॉयल्टी की मांग की थी. सभी गायकों ने मीटिंग रखी, लेकिन रफ़ी साहब , लता और रॉयल्टी मांग रहे सभी सिंगर्स की सोच के खिलाफ थे. हालाँकि, चार साल बाद मशहूर एक्ट्रेस नरगिस की कोशिश से दोनों ने एक साथ एक कार्यक्रम में ‘दिल पुकारे’ गाना गया था....
हिंदी साहित्य जगत के अद्वितीय लेखक व उपन्यास सम्राट कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद थे, जिन्होंने कुल 300 से ज़्यादा कहानियां , 3 नाटक, 15 उपन्यास, 10 अनुवाद , 7 बाल-पुस्तकें लिखीं । मुंशी प्रेमचंद ने अपने साहित्य और लेखों के माध्यम से समाज और राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला । उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस के पास लमही में हुआ था। पिता का नाम अजायब राय था और वे डाकखाने में मामूली नौकरी करते थे। उनका असली नाम “धनपत राय श्रीवास्तव ” था | उर्दू रचनओं में उन्हें “नवाब राय“ कहा जाता था । 13 साल की उम्र से ही प्रेमचन्द ने लिखना शुरू कर दिया था । शुरुआत में कुछ नाटक लिखे और बाद में उर्दू में उपन्यास लिखा। इस तरह उनका साहित्यिक सफर शुरु हुआ , इन रचनाओ के साथ- साथ उन्होंने कहानी, निबंध लिखी उन्होंने प्रेमचंद आज़ादी से पहले के समय के समाज और अंग्रेज़ी शासन के बारे में लिख रहे थे। उन्होंने जनता के शोषण, दुख, दर्द और उत्पीड़न को बहुत बारीकी से महसूस किया और उसे लिखा । प्रेमचंद की पहली प्रकाशित कृति उर्दू में थी और इसका नाम “सोजे–वतन” था । लेकिन अंग्रेज़ी हुकूमत को ये गवारा नहीं था । 1910 में उनकी रचना सोजे़-वतन (राष्ट्र का विलाप) के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने तलब किया और उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगाया । उस समय वे नवाबराय के नाम से लिखते थे। उनकी खोज हुई और उनकी आंखों के सामने सोजे़-वतन की सभी प्रतियां जला दी गईं। कलेक्टर ने उन्हें बिना अनुमति के लिखने पर भी पाबंदी लगा दी। उन्होंने ‘माधुरी’ और ‘मर्यादा’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया तथा ‘हंस’ और ‘जागरण’ समाचार पत्र भी प्रकाशित किये । 20वीं सदी में उर्दू में प्रकाशित होने वाली ‘ज़माना’ पत्रिका के संपादक और प्रेमचंद के घनिष्ठ मित्र मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें प्रेमचंद नाम से लिखने की सलाह दी। इसके बाद नवाबराय हमेशा के लिए प्रेमचंद हो गए और इसी नाम से लिखने लगे । प्रेमचंद के पहले उपन्यास का नाम सेवासदन था। सेवासदन 1918 में प्रकाशित हुआ था। यह उपन्यास मूल रूप से ‘बाजारे-हुस्न’ नाम से पहले उर्दू में लिखा गया लेकिन इसका हिन्दी रूप ‘सेवासदन’ पहले प्रकाशित हुआ । 1921 में किसान जीवन पर उनका उपन्यास ‘प्रेमाश्रम‘ प्रकाशित हुआ। अवध के किसान आंदोलनों के दौर में ‘प्रेमाश्रम’ किसानों के जीवन पर लिखा हिंदी का पहला उपन्यास है । फिर ‘रंगभूमि’, ‘कायाकल्प’, ‘निर्मला’, ‘गबन’ और’कर्मभूमि’ से होता हुआ उपन्यास लिखने का उनका यह सफर 1936 में ‘गोदान’ तक पहुंचा । इसके अलावा सैकड़ों लेख, संपादकीय लिखे जिसकी गिनती नहीं है। हालांकि उनकी कहानियां और उपन्यास उन्हें प्रसिद्धि के जिस मुकाम तक ले गए वो आज तक अछूता है। प्रेमचंद के उपन्यासों में ‘गोदान’ सबसे ज़्यादा मशहूर हुआ और विश्व साहित्य में भी उसका बहुत महत्वपूर्ण स्थान है । प्रेमचंद ने कई कहानियो का अनुवाद भी किया हैं जैसे “टोल्त्स्टॉय की कहानियाँ “ (1923) , गाल्स्वर्दी के तीन नाटको का अनुवाद (1924), चांदी कि डिबिया(1931) , न्याय(1931) नाम से अनुवाद किया | कफन, पूस की रात, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा आदि तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं। उनका रतननाथ के उर्दू उपन्यास “फ़सान- ए –आज़ाद” का हिन्दी अनुवाद आज़ाद कथा बहुत प्रसिद्ध हुआ | उन्होंने कई कहानियाँ भी लिखी जैसे राष्ट्र का सेवक , बंद दरवाजा, यह भी नशा वह भी नशान , देवी, कश्मीरी सेब आदि रचनाये की | सवा सेर गेहूं , पूस की रात जैसी लघु कथाएँ और गोदान जैसे उपन्यास समाज में शोषणकारी स्थितियों को दर्शाते हैं | प्रेमचंद ने तीन नाटको कि रचना कि कर्बला,संग्राम, प्रेमकी वेदी (1933)अत्यंत प्रसिद्ध हुई थी | प्रेमचंद कि रचानाओ को आज भी यादकिया जाता हैं | साहित्य जगत में उनका योगदान आद्वितीय हैं | प्रेमचंद की कई रचनाओं का उनकी मृत्यु के बाद रूसी और अंग्रेजी में अनुवाद किया | पुरस्कार :- उन्हें कभी किसी पुरस्कार से सम्मानित नहीं किया गया था । लेकिन महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी की ओर से साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले साहित्यकार को प्रेमचंद पुरस्कार दिया जाता है। पुरस्कार में 25,000 रुपये नकद, स्मृति चिह्न, शॉल और श्रीफल प्रदान किए जाते हैं एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भी एक साहित्य पुरस्कार “प्रेमचंद स्मृति पुरस्कार” नाम से प्रदान किया जाता है । मुंशी प्रेमचंद की स्मृति में भारतीय डाक विभाग की ओर से 31 जुलाई, 1980 को उनकी जन्मशती के अवसर पर 30 पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया गया था । गोरखपुर के जिस स्कूल में वे शिक्षक थे, वहाँ प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना की गई है। मृत्यु :- प्रेमचंद को 1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अध्यक्ष के रूप में चुना गया था। कई दिनों की बीमारी के बाद और पद पर रहते हुए 8 अक्टूबर वर्ष 1936 को बनारस में उनकी मृत्यु हो गई थी।
कि तया क्रियते धेन्वा या न दोग्ध्रो न गर्भिणी | कोर्थ: पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न भक्तिमान...
शिक्षा हमें प्रकाशवान बनाती है। हमारे अंतस में प्रज्ञा लाती है। हम संस्कारवान शिक्षा से सामाजिक बनते...
रांची, 31 जुलाई । पूर्व केंद्रीयमंत्री संतोष गंगवार ने आज सुबह 10 बजे यहां झारखंड के राज्यपाल के...
भाेपाल, 31 जुललाई । मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव आज (बुधवार) को आरएसएस के पदाधिकारियों से मुलाकात करेंगे।...
इंफाल, 31 जुलाई । मणिपुर में हथियार और गोला बारूद की बरामदगी का सिलसिला लगातार जारी है।...
भोपाल, 31 जुलाई । मध्यप्रदेश में तीन गांवों को नए नाम मिले हैं। राज्य सरकार ने इनके नाम...
