डिब्रूगढ़ (असम), 3 मई। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि समाज में भागीदारी, समानता और प्रगति लाने के लिए शिक्षा सबसे प्रभावी और रूपांतरकारी तंत्र है। लोगों की शिक्षा के अलावा सामाजिक परिस्थितियों को कोई और नहीं बदल सकता है।
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ बुधवार को डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के 21वें दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे। उपराष्ट्रपति ने छात्रों से “परिवर्तन के एजेंट” बनने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए कार्य करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र वर्ष 2047 में अपनी स्वाधीनता की शताब्दी मनाएगा, आप उसी भारत के निर्माता और योद्धा हैं।
उन्होंने कहा कि प्रतियोगिता सर्वश्रेष्ठ गुरु है और भय सबसे बड़ा शत्रु। विद्यार्थी बड़े सपने देखें और कभी भी तनावग्रसित न हों। “सपने देखो लेकिन सिर्फ सपने देखने वाले ही न बनो, एक कर्ता की भांति कर्म के बल पर सपनों को पूरा करो।”
पूर्वोत्तर के आठ राज्यों को भारत की “अष्ट लक्ष्मी” के रूप में प्रशंसा करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि पूर्वोत्तर राज्यों के विकास और योगदान के बिना, भारत का विकास अधूरा रहेगा। उन्होंने इन क्षेत्रों की भाषाई विविधता और साहित्यिक परंपराओं को संरक्षित करने की दिशा में काम करने के लिए डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय की सराहना की। उन्होंने कहा कि हमारी भाषाओं का संरक्षण बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे हजारों वर्षों में विकसित हुई हैं। उपराष्ट्रपति ने इतिहास और स्वाधीनता संग्राम में पूर्वोत्तर के गुमनाम योद्धाओं के योगदान को सामने लाने के लिए एनसीईआरटी और भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) की प्रशंसा की।
सरकार की पूर्वोत्तर क्षेत्र के भौतिक, सामाजिक और डिजिटल मूलभूत ढांचे के सुधार पर ध्यान केंद्रित किए जाने की सराहना करते हुए धनखड़ ने कहा कि पूर्वोत्तर अवसरों की भूमि के रूप में उभर रहा है। उन्होंने विभिन्न परियोजनाओं- बोगीबील रेल-कम रोड ब्रिज, 375 सड़क परियोजनाएं, हवाई अड्डों की संख्या 9 से बढ़ाकर 17 करने और 190 नए शैक्षणिक संस्थानों की स्थापित करने की भी प्रशंसा की।
भारत की विकास गाथा को ‘अनवरत’ बताते हुए उपराष्ट्रपति ने विश्वास व्यक्त किया कि दशक के अंत तक हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होंगे। 99.9 प्रतिशत भारतीयों को डिजिटल आईडी (आधार), जनधन आधार और मोबाइल (जेएएम ट्रिनिटी), मुद्रा और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि प्रदान जैसी कई महत्वपूर्ण उपलब्धियों का उल्लेख किया।
संसद को लोकतंत्र का मंदिर बताते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह एक ऐसा मंच है, जहां जनहित के मुद्दों पर बहस, विचार-विमर्श, चर्चा और निर्णय लिया जाता है। उन्होंने एक इकोसिस्टम बनाने का आह्वान किया ताकि हमारे सांसद, संविधान के संस्थापकों की मूल भावना के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करें। धनखड़ ने छात्रों से अपने गुरुओं और अपने अल्मा-मेटर को न भूलने का भी आह्वान किया।
इस अवसर पर उपराष्ट्रपति धनखड़ ने असम की प्रतिष्ठित विभूतियों को डॉक्टर ऑफ साइंस और डी. लिट डिग्री (मानद उपाधि) से सम्मानित किया। उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर में पौधारोपण भी किया।
इस अवसर पर राज्यपाल और डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के कुलाधिपति गुलाब चंद कटारिया, मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्व सरमा, केंद्रीय पेट्रोलियम राज्यमंत्री रामेश्वर तेली, असम सरकार के शिक्षा मंत्री डॉ. रानोज पेगू, डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जितेन हजारिका, बोर्ड के सदस्य, निदेशक, संकाय, कर्मचारी, विद्यार्थी और छात्रों के परिजन भी मौजूद थे।
