नई दिल्ली, । शिरोमणि अकाली दल (शिअद बादल) और भाजपा के बीच फिर से राजनीतिक गठजोड़ की चर्चा है। दोनों पार्टियों के साथ आने से दिल्ली की सिख सियासत में बदलाव आना तय है। यहां नए समीकरण बनेंगे। इससे नेताओं के पाला बदलने का खेल शुरू हो सकता है, क्योंकि कभी अकाली दल का चेहरा रहे सिख नेता अब भाजपा के साथ हैं।
वहीं, भाजपा व बादल परिवार के विरोध की राजनीति करने वाले सिख नेता परमजीत सिंह सरना प्रदेश में अकाली दल की कमान संभाल रहे हैं। शिअद बादल और भाजपा का गठबंधन टूटने से दिल्ली की सिख राजनीति में भी बड़ा बदलाव आया था। यहां बादल दल का चेहरा माने जाने वाले मनजिंदर सिंह ने सबसे पहले पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया।
उसके बाद पिछले वर्ष मार्च में दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (डीएसजीएमसी) के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका का बादल दल से नाता टूट गया। उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण शिअद बादल से निष्कासित कर दिया गया, जिसके बाद उन्होंने शिरोमणि अकाली दल दिल्ली स्टेट नाम से नई धार्मिक पार्टी बना ली। शिअद बादल के टिकट पर चुने हुए डीएसजीएमसी के कई सदस्य को अपने साथ लाने में वह सफल रहे।
इस दिल्ली में पार्टी का अस्तित्व बचाने के लिए सुखबीर सिंह बादल ने अपने धुर विरोधी परमजीत सिंह सरना से नजदीकी बढ़ाने को मजबूर हो गए। उन्होंने पिछले वर्ष अक्टूबर में प्रदेश की कमान उनके हाथ में सौंप दी। सरना पिछले कई वर्षों से शिरोमणि अकाली दल दिल्ली नाम से धार्मिक पार्टी बनाकर डीएसजीएमसी की राजनीति करते रहे हैं। वह कांग्रेस के नजदीक रहे हैं। अपरोक्ष रूप से दोनों का एक दूसरे का समर्थन रहा है।
शिअद बादल ने वर्ष 2013 के चुनाव में पराजित कर उन्हें डीएसजीएमसी की सत्ता से बाहर किया था। उसके बाद से उनके हाथ में सत्ता नहीं आई है। अब नए राजनीतिक घटनाक्रम से उनके सामने दुविधा की स्थिति उत्पन्न होगी, क्योंकि भाजपा व अकाली दल के बीच गठबंधन होने से कालका सहित कई पुराने सिख नेता एक बार फिर से बादल के करीब आ सकते हैं।
इस स्थिति में सरना का अपने विरोधी नेताओं के साथ तालमेल कायम करना आसान नहीं होगा। संभव है कि वह जग आसरा गुरु ओट के अध्यक्ष मनजीत सिंह जीके के साथ मिलकर नया मोर्चा बना लें। यह सब शिअद बादल व भाजपा के बीच गठबंधन की घोषणा बाद की संभावना है, फिलहाल दिल्ली के सिख नेता राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं।
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