रामशास्त्री प्रभुणे का पेशवा बड़ा आदर करते थे और राजकाज में उनकी बराबर सलाह ली जाती थी | दानाध्यक्ष का भार भी उन्हें ही सौंपा गया था |
एक बार वे भिक्षुकों को दक्षिणा बाँट रहे थे कि आगंतुकों ने उन्हें अपने सगे भाई दिखाई दिए | जब उनकी बारी आयी, तो समीप बैठे नाना फड़नवीस ने कहा, “मैं समझता हूँ, आपको अपने बंधु को बीस रूपये दक्षिणा देनी चाहिए |”
“मेरे भाई कोई विशेष विद्वान् नहीं, साधारण ही हैं | इसलिए दूसरे ब्राम्हणों की तरह इन्हें भी दो रूपये देना ही ठीक होगा | रामशास्त्री के पास भाई -भतीजे के लिए किसी प्रकार के पक्षपात की कतई गुंजाइश नहीं है |” – रामशास्त्री के करारी और दृढ़निश्चयी स्वभाव से भलीभांति परिचित थे | रामशास्त्री ने भाई को दो रुपये दिए और वे भी उसे दो रूपये लेकर चुपचाप चलते बने |
