यावत्स्वस्थो ह्राय देह: तावन्मृतयुश्च दूरत: |
तावदातमहितं कुर्यात प्राणांते किं करिष्यति ||
आचार्य चाणक्य यहां इन पंक्तियों में आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हुए प्रबोधित कर रहे हैं कि जब तक शरीर स्वस्थ है, तभी तक मृत्यु भी दूर रहती है | अत: तभी आत्मा का कल्याण कर लेना चाहिए | प्राणों का अंत हो जाने पर क्या करेगा ? केवल पश्चाताप ही शेष रहेगा |
यहां आशय यह है कि जब तक शरीर स्वस्थ रहता है, तब तक मृत्यु का भी भय नहीं रहता | अत: इसी समय में आत्मा और परमात्मा को पहचानकर आत्मकल्याण कर लेना चाहिए | मृत्यु हो जाने पर कुछ भी नहीं किया जा सकता |
आचार्य चाणक्य का कहना है कि समय गुजरता रहता है, और न जाने कब व्यक्ति को रोग घेर ले और कुछ मृत्यु का सन्देश ले यमराज के दूत द्वार पर आ खड़े हों, इसलिए मानव को चाहिए कि वह जीवन में अधिक-से-अधिक पुण्य कर्म करे क्योंकि समय का क्या भरोसा? जो कुछ करना है समय पर ही कर लेना चाहिए |
