कामधेनुगुणा विद्या ह्रायकाले फलदायिनी |
प्रवासे मातृसदृशा विद्या गुप्तं धनं स्मृतम ||
आचार्य चाणक्य यहां विद्या के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए उसके प्रयोजन और उपयोग की चर्चा कर रहे हैं | उनका कहना है कि विद्या कामधेनु के सामान गुणोंवाली है, बूरे समय में फल देनेवाली है, प्रवास काल में माँ के सामान है तथा गुप्त धन है |
आशय यह है कि विद्या कामधेनु के समान सभी इच्छाओं को पूरा करनेवाली है | बूरे-से-बूरे समय में भी यह साथ नहीं छोड़ती | घर से कहीं बाहर चले जाने पर भी यह मां के समान रक्षा करती है | यह एक गुप्त धन है, इस धन को कोई नहीं देख सकता |
आचार्य चाणक्य मानते हैं कि विद्या एक गुप्त धन है अर्थात एक ऐसा धन है जो दिखाई नहीं देता पर वह है और अनुभव की वस्तु है | जिसका हरण तथा विभाजन नहीं हो सकता, अत: वह सब प्रकार से सुरक्षित और विश्वसनीय भी है | वही समय पड़ने पर आदमी के काम आता है |
इस प्रकार विद्या संकट में कामधेनु के समान और प्रदेश में माँ के समान है | सबसे बड़ी बात यह है कि यह प्रच्छन्न और सुरक्षित धन है |
