रहीम खानखाना मुसलमान होने पर भी कृष्ण के अनन्य भक्त थे | एक बार दिल्ली के बादशाह की आज्ञा से उन्होंने दक्षिण भारत के एक हिंदू राजा पर आक्रमण कर दिया | घोर युद्ध हुआ और अंत में रहीम खानखाना की विजय हुई | उस हिंदू राजा ने रहीम के पास यह प्रस्ताव भेजा- “विजय तो आपकी हो गयी है | अब ऐसी स्थिति में हम लोग परस्पर मित्र बन जाते, तो मेरे लिए यह गौरव कि बात होती |”
रहीम एक सज्जन व्यक्ति थे | उन्होंने राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, क्योंकि किसी को भी नीचा दिखाना उन्हें अच्छा नहीं लगता था | दूसरे दिन राजा ने रहीम से प्रार्थना की- “खान साहेब! यहां से जाने से पूर्व एक बार मेरे घर पर भोजन करिये |”
रहीम ने यह प्रस्ताव भी स्वीकार कर लिया | और शाम का भोजन तय हो गया |
सन्ध्या समय एक सिपाही साथ लेकर वे राजा के किले में भोजन के लिए चले गए | किले के फाटक पर पहुँचे ही थे कि उन्हें वहाँ पर एक बालक मिला | बालक ने पूछा- “खान साहब ! कहाँ जा रहे हैं ?”
“राजा के यहां भोजन करने जा रहा हूँ |”
“मत जाइये |”
“क्यों |”
“इसलिए कि राजा के मन में पाप है | उसने आपके भोजन में विष मिला दिया है | आपको मारकर फिर वह युद्ध करेगा तथा आपकी सेना को मार कर भगा देगा |”
“पर मैं तो वचन दे चूका हूँ कि भोजन करूंगा |”
“ वचन तोड़ दीजिये |”
“वह मेरे लिए बड़ा कठिन है |”
बालक ने बड़ी देर तक रहीम को समझाने का यत्न किया | किन्तु रहीम राजा के किले में जाकर भोजन करने के पक्ष में ही रहे | उन्होंने बालक को यह दोहा कहा-
अमी पियावत मानबिनु, कह रहीम न सुहाय |
प्रेम सहित मरिवौ भलौ, जो विष देय बुलाया ||
किन्तु बालक उन्हें फिर रोकता रहा | अंत में रहीम ने हँसकर कहा-“क्या तु भगवान् श्री कृष्ण है, जो तेरी बात मान लूँ ?”
बालक यह सुनकर खिलखिलाकर हँस पड़ा | रहीम उस बालक की और आश्चर्यभरी दृष्टि से देखने लगे | इतने में वहां एक प्रकार से परम दिव्य प्रकाश फैला गया | रहीम को और आश्चर्य हुआ | रहीम जैसे सोते से जगे | उन्होंने भीतर न जाना उचित समझा और वहाँ से लौट पड़े |
आकर उसी समय उन्होंने किले पर चढ़ाई कर दी | एक पहर के अंदर उन्होंने राजा को बंदी बना लिया | राजा को जब बंदी के वेष में रहीम के सम्मुख लाया गया तो रहीम ने उससे पूछा – “क्यों राजा साहब ! मित्र को भी विष दिया जाता है ?”
राजा ने सिर नीचे कर लिया पर उसे इस बात पर आश्चर्य हो रहा था कि रहीम को इस बात का ज्ञान किस प्रकार हो गया ? क्योंकि उसके अतिरिक्त अन्य किसी को भी इस बात का ज्ञान नहीं था | उसने हाथ जोड़कर पूछा – “खान साहब! मैं जनता हूँ कि मुझे मृत्यु दंड मिलेगा | किन्तु मैं यह जानना चाहता हूँ कि आपको यह रहस्य किस प्रकार विदित हो गया?”
रहीम ने कहा- “मैं अपने मित्र की हत्या नहीं करूँगा | आपको मृत्यु दंड नहीं मिलेगा | रही रहस्य घटना की बात, उसे मैं बताना नहीं चाहता |”
राजा ने पृथ्वी पर सिर रखकर कहा- “मुझे प्राणों की भीख न देकर, केवल उसी बात को बता देने की भीख दें |”
रहीम बोले- “अच्छी बात है, लीजिये सुन लीजिए | मेरे और आपके प्रभु श्रीकृष्ण ने मुझे यह बात बताई थी |”
राजा फूट-फूट कर रोने लगा | रहीम ने उसकी हथकड़ी-बेड़ी खुलवा दी और उसे हृदय से लगा लिया | दोनों उस दिन से सच्चे मित्र हो गये |
