हिंदू पंचांग के अनुसार हर एक वर्ष भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान के साथ विवाहित महिलाएं व्रत रखते हुए पूजा-पाठ करती हैं। हरतालिका तीज पर सुहागिन महिलाएं दिनभर निर्जला व्रत रखती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए पहली बार हरतालिका तीज का व्रत किया आइए जानते हैं हरतालिका व्रत पूजा विधि और शुभ मुहूर्त।
पूजा मुहूर्त
हरतालिका तीज वाले दिन 6 सितंबर को पूजा का मुहूर्त सुबह 06:02 बजे से 08:33 मिनट तक है. इस समय में व्रती महिलाएं पूजा न कर पाएं, तो वह शाम को सूर्यास्त होने के बाद प्रदोष काल शुरू होने पर भी कर सकती हैं. इस दिन सूर्यास्त का समय 06:36 बजे बताया गया है. इस समय व्रती महिलाएं समूह में बैठकर हरतालिका तीज की व्रत कथा सुनती हैं. हरतालिका तीज के दिन अभिजीत मुहूर्त 11:54 बजे से दोपहर 12:44 मिनट तक है |
चर-सामान्य मुहूर्त- सुबह में 06:02 बजे से 07:36 बजे तक
लाभ-उन्नति मुहूर्त- सुबह में 07:36 बजे से 09:10 बजे तक
अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त- सुबह में 09:10 बजे से 10:45 बजे तक
शुभ-उत्तम मुहूर्त- दोपहर में 12:19 बजे से 01:53 बजे तक
चर-सामान्य मुहूर्त- शाम में 05:02 बजे से 06:36 बजे तक
हरतालिक तीज 2024 पूजा विधि
आज व्रती महिलाओं को शाम के समय में घर को तोरण से सजाना चाहिए.2. घर के आंगन में कलश, माता पार्वती और भगवान शिव जी की स्थापना करके उनका षोडशोपचार और पंञ्चोपचार पूजन करें.
शिव जी को 5 वस्त्र और माता गौरी को 3 वस्त्र के साथ सोलह श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें.
पूजा के समय में हरतालिक तीज की व्रत कथा सुनें. अंत में माता गौरी और भगवान शिव की आरती करें.
रात के समय में जागरण करें. उसके अगली सुबह यानी कल 7 सितंबर को प्रात: स्नान आदि से निवृत होकर दान-दक्षिणा दें. फिर पारण करके व्रत को पूरा करें.
हरतालिक तीज 2024 व्रत का पारण समय
सितंबर, शनिवार को सुबह 06:02 बजे से सूर्योदय के साथ.
हरतालिका तीज से जुड़ी पौराणिक कथा
एक कथा के अनुसार माँ पार्वती ने अपने पूर्व जन्म में भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय पर गंगा के तट पर अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया। इस दौरान उन्होंने अन्न का सेवन नहीं किया। काफी समय सूखे पत्ते चबाकर ही काटे और फिर कई वर्षों तक उन्होंने केवल हवा ही ग्रहण कर जीवन व्यतीत किया। माता पार्वती की यह स्थिति देखकर उनके पिता अत्यंत दुःखी थे।
इसी दौरान एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से पार्वतीजी के विवाह का प्रस्ताव लेकर माँ पार्वती के पिता के पास पहुँचे जिसे उन्होंने सहर्ष ही स्वीकार कर लिया। पिता ने जब बेटी पार्वती को उनके विवाह की बात बतलाई तो वे बहुत दु:खी हो गईं और जोर-जोर से विलाप करने लगीं।
फिर एक सखी के पूछने पर माता ने उसे बताया कि वे यह कठोर व्रत भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कर रही हैं, जबकि उनके पिता उनका विवाह श्री विष्णु से कराना चाहते हैं। तब सहेली की सलाह पर माता पार्वती घने वन में चली गईं और वहाँ एक गुफा में जाकर भगवान शिव की आराधना में लीन हो गईं। माँ पार्वती के इस तपस्वनी रूप को नवरात्रि के दौरान माता शैलपुत्री के नाम से पूजा जाता है।
भाद्रपद शुक्ल तृतीया तिथि के हस्त नक्षत्र मे माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और भोलेनाथ की स्तुति में लीन होकर रात्रि जागरण किया। तब माता के इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और इच्छानुसार उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।
मान्यता है कि इस दिन जो महिलाएं विधि-विधानपूर्वक और पूर्ण निष्ठा से इस व्रत को करती हैं, वे अपने मन के अनुरूप पति को प्राप्त करतीं हैं। साथ ही यह पर्व दांपत्य जीवन में खुशी बनाए रखने के उद्देश्य से भी मनाया जाता है।
