मूर्खाणां पंडिता द्वेष्या अधनानां महाधना |
वारांगना कुलीनानां सुभागानां च दुर्भगा ||
आचार्य चाणक्य यहाँ द्वेष करनेवालों की चर्चा करते हुए कहते हैं कि मुर्ख पंडितों से, निर्धन धनियों से, वेश्याएं कुलवधुओं से तथा विधवाएं सुहागिनों से द्वेष करती हैं |
अर्थात् मूर्ख व्यक्ति पंडित को देखकर जलता है, विद्वान् व्यक्तियों से द्वेष करता है| इसी प्रकार निर्धन-गरीब व्यक्ति सेठों से द्वेष रखते हैं, क्योंकि उनकी सम्पन्नता उसे खलती है | वैश्याएं अच्छे घरों की बहू-बेटियों से जलती हैं क्योंकि वेश्याओं को कुलीन वधुओं के समान भावनात्मक स्नेह नहीं मिल पाता, केवल शरीर का शोषण ही होता है विधवा स्त्रियाँ सुहागिनों को देखकर मन-ही-मन अपने भाग्य पर रोती हैं कि उनका सौभाग्य सुख दैव ने उससे छीन लिया | पति विहीना होना उनके लिए अभिशाप ही तो हैं !
