नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष ने बताया कि छठी और सातवीं विधानसभा के दौरान विशेषाधिकार समिति, याचिका समिति और प्रश्न एवं संदर्भ समिति को भेजे गए लंबित मामलों पर आगे कोई कार्रवाई नहीं करने और उन्हें निपटाया हुआ मानने का सदन ने निर्णय लिया है। लंबित मामलों में कुछ दिल्ली सरकार के अधिकारियों से जुड़े हुए हैं।
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि 4 दिसंबर 2024 को आयोजित अपनी बैठक में, सातवीं विधानसभा ने तीन प्रस्ताव पारित किए गए थे कि विशेषाधिकार समिति, याचिका समिति और प्रश्न एवं संदर्भ समिति के अधूरे कार्यों की जांच नियम-183 के तहत आठवीं विधानसभा की संबंधित समितियों द्वारा की जाए। नियम-183 के तहत विधानसभा के भंग होने से पहले किसी भी समिति के अधूरे कार्य को नई विधानसभा की समिति को भेजा जा सकता है। छठी और सातवीं विधानसभा के भंग होने के समय विधानसभा ने इन तीनों समितियों के अधूरे कार्य को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव पारित किया था।
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि समिति के समक्ष लंबित सभी मामलों की जांचोपरांत तय किया गया कि इन मामलों को आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए था। छठी विधानसभा के 59 मामले और सातवीं विधानसभा के 69 मामले विशेषाधिकार समिति द्वारा लंबित रखे गए थे। नियम-223 के अनुसार विशेषाधिकार समिति को आम तौर पर एक महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट दे देनी चाहिए। अधिकतर शिकायतें तत्कालीन सत्तारूढ़ दल के सदस्यों द्वारा दिल्ली सरकार के अधिकारियों के खिलाफ दर्ज की गई थीं। आदर्श रूप से, यदि शिकायतें वास्तविक होतीं तो समितियों को इन मामलों की जांच करनी चाहिए थी और सदन को रिपोर्ट करनी चाहिए थी। हालांकि, इनको समिति के तत्कालीन सदस्यों में जिन कारणों से लंबित रखा था, उन कारणों का उन्हें ही ज्यादा पता था।
इसी तरह, याचिका समिति के पास छठी विधानसभा के 107 मामले और सातवीं विधानसभा के 72 मामले लंबित थे। प्रश्न एवं संदर्भसमिति में भी सातवीं विधानसभा के 04 मामले लंबित हैं। इन समितियों में भी दिल्ली सरकार के अधिकारियों को निशाना बनाने का प्रयास किया गया। इन समितियों के समक्ष कुछ मामले वर्ष 2016 से ये लंबित है और उनकी जांच के लिए कोई बैठक नहीं हुई। कुछ अधिकारियों ने न्यायालयों से संरक्षण मांगा और इनमें से आठ केस अब दिल्ली उच्च न्यायालय में हैं।
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि आठवीं विधानसभा की समितियों को साफ-सुथरी स्थिति से शुरुआत करनी चाहिए और ऐसे मामलों में नहीं उलझना चाहिए जो पूर्वाग्रह से प्रेरित प्रतीत होते हैं। इसलिए वह सदन से अनुरोध करते हैं कि वह इस पर विचार करे कि इन मामलों को आगे बढ़ाया जाना चाहिए या छोड़ दिया जाना चाहिए। मुख्य सचेतक अभय वर्मा ने इस संबंध में प्रस्ताव पेश करने के लिए नोटिस दिया है। अभय वर्मा ने इस संबंध में प्रस्ताव प्रस्तुत किया और सदन ने इनको छोड़ने का निर्णय लिया है।
