इमाम अहमद हंबल वैराग्य, विद्वत्ता और ज्ञान की प्रतिमूर्ति थे। वे कुरान को मनुष्यकृत मानते और धर्मान्धों एवं काजियों की आलोचना करते थे। इससे धर्मान्धों एवं काजियों की प्रतिहिंसा ने उग्र रूप धारण किया। खलीफा के कान भरे गये। ‘कुरानशरीफ’ का अपमान करने के अपराध में हजरत इमाम हंबल को अदालत में तलब किया गया।
वृद्ध सन्त को बन्दी करके खलीफा के महल के समक्ष ला खड़ा किया गया। अन्यायी शासक के क्रूर अत्याचार की विभीषिका से उनका मन असमंजस में पड़ा था।
तभी महल के द्वार पर पहरा दे रहा एक सिपाही उनके पास आया और फुसफुसाकर बोला, “हजरत ! जुल्म से मत डरियेगा। सच्ची बहादुरी दिखाइयेगा। चोरी के जुर्म में मुझ पर एक बार हजार कोड़े पड़े थे। पर मैंने जुर्म कबूल नहीं किया और मुझे छोड़ दिया गया। मैंने झूठ के लिए कलेजे की ऐसी कड़ाई दिखायी, तो क्या आप सत्य के लिए दहशत खाएँगे?”
वृद्ध सन्त के मन पर छाया भय का अन्धकार दूर हुआ। वे विह्वल स्वर में बोले, “तू ठीक कहता है, अजी-जेमन ! तूने ठीक वक्त पर मुझे जगाया है,” – और खलीफा के दरबार में सन्त ने निर्भीकतापूर्वक धर्मान्धों के रोष का सामना किया। उन्हें हजार बेंत लगाये जाने का हुक्म हुआ, किन्तु सत्य के लिये उन्होंने इस क्रूरता को हँसते-हँसते सह लिया। बेंतों की मार से श्लथ होकर मृत्यु-मुख में जाते समय भी उन्हें उस चोर सिपाही के वचन स्मरण रहे।
