सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान विष्णु के छठे अवतार श्री परशुराम जी का प्राकट्य हुआ था। इस पावन दिवस को संपूर्ण भारत में परशुराम जयंती के रूप में अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
श्री परशुराम जी का जन्म भृगु कुल के महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर हुआ था। उन्हें अजर-अमर माना जाता है, इसलिए वे सप्त ऋषियों की तरह ‘चिरंजीवी’ कहे जाते हैं और माना जाता है कि वे आज भी महेंद्र पर्वत पर निवास करते हैं। उनका नाम मूलतः ‘राम’ था, लेकिन भगवान शिव की कठोर तपस्या के पश्चात जब उन्हें दिव्य अस्त्र ‘परशु’ (फरसा) प्राप्त हुआ, तब से वे ‘परशुराम’ कहलाए। उनका व्यक्तित्व ब्राह्मणोचित शांति और क्षत्रियोचित शौर्य का एक अनूठा संगम है, जो समाज को यह संदेश देता है कि ज्ञान की रक्षा के लिए शक्ति का होना अनिवार्य है।
श्री परशुराम जी के प्राकट्य का मुख्य उद्देश्य पृथ्वी पर बढ़ते हुए अधर्म और आततायी शक्तियों का विनाश करना था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उस काल में हैयय वंश के राजा कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्त्रार्जुन) ने अपनी शक्ति के मद में आकर ऋषियों और निर्दोष प्रजा पर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया था। यहाँ तक कि उसने महर्षि जमदग्नि की दिव्य कामधेनु गाय का बलपूर्वक अपहरण कर लिया। इस अन्याय के विरुद्ध भगवान परशुराम ने शस्त्र उठाया और न केवल सहस्त्रार्जुन का वध किया,
बल्कि इक्कीस बार पृथ्वी को अत्याचारी राजाओं से मुक्त कराया। उनका यह कृत्य व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और धर्म की स्थापना का एक महायज्ञ था। उन्होंने सदैव शस्त्र का प्रयोग केवल आततायियों के दमन के लिए किया और निर्दोषों को न्याय दिलाया।
भगवान परशुराम केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि महान विद्वान और गुरु भी थे। उन्होंने ही केरल और कोंकण क्षेत्र की भूमि को समुद्र से मुक्त कराकर वहां कृषि और सभ्यता का विस्तार किया था। उनके शिष्यों में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और दानवीर कर्ण जैसे महान योद्धा शामिल थे, जिन्हें उन्होंने अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी थी। उनकी जयंती का पर्व हमें यह सिखाता है कि शक्ति का सदुपयोग सदैव लोक कल्याण के लिए होना चाहिए।
इस दिन भक्त उपवास रखते हैं, शोभायात्राएं निकालते हैं और उनके शौर्य की गाथाओं का गान करते हैं। आज के संदर्भ में श्री परशुराम जी का जीवन यह प्रेरणा देता है कि हमें अपनी संस्कृति और ज्ञान (शास्त्र) को सुरक्षित रखने के लिए स्वयं को सामर्थ्यवान (शस्त्र) बनाना अत्यंत आवश्यक है, ताकि अधर्म पर धर्म की विजय सदैव बनी रहे।
