अंतरराष्ट्रीय मंच पर पदक जीतने के बेहद करीब पहुंचकर चूकने वाले भारतीय लाइटवेट पैरा पावरलिफ्टर अशोक कुमार मलिक ने अपने प्रदर्शन से सभी का ध्यान आकर्षित किया। इवेंट खत्म होने के कुछ घंटों बाद ग्लासगो एग्जिबिशन सेंटर के पास अपनी व्हीलचेयर चलाते हुए अशोक के चेहरे पर निराशा साफ दिखाई दे रही थी। कुछ समय पहले तक जो खिलाड़ी पदक की दौड़ में था, वह अब भीड़भरी सड़क पर एक आम व्यक्ति की तरह आगे बढ़ रहा था।
हालांकि, पदक उनके हाथ नहीं आया, लेकिन उनका सफर और प्रदर्शन किसी उपलब्धि से कम नहीं रहा। बचपन के लकवे और हाथ की चोट जैसी कठिन चुनौतियों को पार कर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचना अपने आप में बड़ी सफलता है। 143.8 अंकों के साथ चौथे स्थान पर रहे मलिक लाइटवेट पावरलिफ्टिंग स्पर्धा में अशोक कुमार मलिक ने शानदार शुरुआत की। उन्होंने अपने पहले प्रयास में 195 किलोग्राम वजन उठाया। इसके बाद दूसरी कोशिश में उन्होंने 200 किलोग्राम भार सफलतापूर्वक उठाकर पदक की उम्मीदों को मजबूत किया।
मलिक ने अंतिम प्रयास में 205 किलोग्राम वजन उठाने की कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो सके। उन्होंने प्रतियोगिता में कुल 143.8 अंक हासिल किए और चौथे स्थान पर रहे। पोडियम पर पहुंचने वाले खिलाड़ियों में मार्क स्वान और रोलैंड एज़ुरुइके ने 153.9-153.9 अंक हासिल किए, जबकि बॉनी गुस्टिन 153.5 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। मलिक इन खिलाड़ियों से पीछे रह गए और पदक से कुछ ही दूरी पर रुक गए। उनका अंतिम प्रयास सफल हो जाता, तब भी पदक की स्थिति में बदलाव नहीं होता, लेकिन उनके प्रदर्शन ने यह जरूर साबित किया कि वह दुनिया के शीर्ष खिलाड़ियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता रखते हैं।
संघर्षों से भरा रहा है मलिक का सफर अशोक कुमार मलिक की कहानी केवल एक खेल प्रतियोगिता तक सीमित नहीं है। उन्होंने बचपन में लकवे जैसी गंभीर समस्या का सामना किया। इसके अलावा हाथ की चोट ने भी उनके सामने बड़ी चुनौती खड़ी की, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। कड़ी मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने पैरा पावरलिफ्टिंग में अपनी पहचान बनाई। वह नौ बार राष्ट्रीय चैंपियन रह चुके हैं और एशियन गेम्स में भी पदक जीतकर देश का नाम रोशन कर चुके हैं।
