उत्तरप्रदेश :- स्वाधीनता के आंदोलन में ब्रिटिश नौकरशाही ने देशभक्तों पर बहुत जुल्म किए, लेकिन इस दमन से कोई व्यवधान नहीं आया, बल्कि इसने स्वाधीनता के यज्ञ में घी का ही काम किया था। अंग्रेजों ने सीधे-सीधे फांसी पर लटकाने, गोली चलाने के अलावा अनेक आंदोलनकारियों को धीमा जहर (स्लो पॉइजन) देकर भी काल के गाल में धकेल दिया था। ऐसे ही एक क्रांतिकारी थे चंद्रभाल जौहरी। शीतला गली में उनका निवास था और उनके पिता का नाम मेवाराम था। इनके बड़े भाई चंद्रधर जौहरी भी स्वाधीनता संग्राम के क्रांतिकारी थे। उन्होंने शहीद गेंदालाल दीक्षित के साथ आंदोलनों में भाग लिया था।
वर्ष 1940-41 में महात्मा गांधी के आह्वान पर व्यक्तिगत सत्याग्रह चलाया जा रहा था। राष्ट्रीय स्तर पर इसके प्रथम सत्याग्रही आचार्य विनोबा भावे थे, दूसरे पं. जवाहरलाल नेहरू और तीसरे ब्रह्मदत्त थे। आगरा में भी यह आंदोलन हुआ, जिसमें पं.श्रीकृष्ण दत्त पालीवाल, पं.जगन प्रसाद रावत आदि के नेतृत्व में यह आंदोलन शुरू हुआ।
चंद्रभाल जौहरी ने भी व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। चंद्रधर जौहरी के भाई होने के कारण पुलिस इनसे बहुत आतंकित थी। इनको इतना प्रताड़ित किया कि जेल में बीमार रहने लगे। भोजन त्याग दिया और शरीर जर्जर हो गया। ज्यादा बीमार हो गए तो इनकी जांच के लिए लखनऊ से एक डाॅक्टर लाल को बुलाया गया था। उन्होंने कह दिया था कि इनके जीवन का संध्या काल आ चुका है। इसलिए अंग्रेज प्रशासन ने पांच फरवरी 1943 को इन्हें पैरोल पर छोड़ दिया।
कारागार से रिहा होकर वे घर आ गए। डॉक्टरों को दिखाया तो उनका कहना था कि जेल में अंग्रेजों ने इन्हें धीमा जहर दे दिया है, इसलिए ये अब ज्यादा दिन जीवित नहीं रह पाएंगे। कारागार से रिहा होने के पांच दिन बाद ही 10 फरवरी को चंद्रभाल जौहरी शहीद हो गए। ये ऐसे शहीद हैं, जिनका न कोई स्मारक है, न ही कहीं शिलापट है।
